हिंदुस्तान में रहने के लिए पिता से बगावत कर बैठे थे निदा फाजली
नई दिल्ली | निदाफाजली भले ही हमें छोड़ गए लेकिन उनकी ‘आवाज’ हमेशा गूंजती रहेगी। वह आवाज, जो तो माता-पिता के सामने दबी और ही किसी और के सामने। तभी तो जब देश में दंगे फैलने के बाद उनके पिता मुर्तजा हसन ने पाकिस्तान जाने का निर्णय लिया तो वे बगावती हाे गए। दादाजी के साथ भारत में ही रहे। पढ़ाई ग्वालियर में की। फिर मुंबई का रुख किया। 1998 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
सूरके पद से सीखी शायरी : निदाफाजली का असली नाम मुक्तदा हसन था। निदा फाजली लेखन का नाम था। निदा महसूस करते थे कि वे कुछ ऐसा नहीं लिख पाते जिससे उनके दुख की गिरहें खुलें। एक दिन वे मंदिर में किसी को सूरदास का भजन ‘मधुबन तुम क्यों रहत हरे?’ गाते सुना। फिर उन्होंने सूर, कबीर, तुलसी, बाबा फरीद जैसे कवियों को पढ़ा। सरल भाषा में लिखने लगे। वही उनकी शैली बन गई। उन्होंने पहला फिल्मी गीत (तेरा हिज्र मेरा नसीब है...) रजिया सुल्तान फिल्म के लिए लिखा था। निदा ने हाल ही में कहा था, ‘मुशायरों-कवि सम्मेलनों में सांप्रदायिकता हावी है। सच बोलने वालों का हश्र कलबुर्गी जैसा ही होगा। उनकी जुबान बंद कर दी जाएगी।’
बोझकी तरह हैं उधार के मंगोड़े : निदाहाल ही में ग्वालियर आए थे। वे उस व्यक्ति को ढूंढ़ रहे थे, जो उन्हें सालों पहले उधार में मंगोड़े खिलाता था। कह रहे थे उधार चुकाना है, जो मुझ पर बड़ा बोझ सा है।
निदा-जगजीत की जुगलबंदी ने यादगार गजलें दीं। संयोग से निदा का निधन उसी दिन हुआ जो जगजीत की जयंती थी।
- प्रसून जोशी, गीतकार
निदा साहब के व्यक्तित्व में निश्छलता थी। उनकी शायरी और उनके व्यक्तित्व में कहीं भी ‘करप्शन’ नहीं था। कहावत है न, ‘जैसा तू दिखता है, वैसा तू लिख।’ वह वाली बात। उन्होंने बहुत खूबसूरत चीजें कीं, जैसे दोहों पर प्रयोग खासतौर पर याद किया जा सकता है- ‘मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार, दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी, बिन तार।’ शब्दों का चयन बहुत सुंदर होता था। वे ऐसे उर्दू शायर थे, जिसने हिंदी पर भी साधिकार लिखा। उनकी ‘चलती नटनी जैसी मां,’ याद आती है। मैं जिस पीढ़ी से हूं, वह निदा साहब की बहुत ऋणी रहेगी। (जैसाउन्होंने आनंद देशमुख को बताया)