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- {ढोलक, मंजीरे की ताल सुनकर बच्चे समझ जाते हैं मंच पर कब चलना है, कहां रुकना है, इसलिए गिरते नहीं हैं।
{ढोलक, मंजीरे की ताल सुनकर बच्चे समझ जाते हैं मंच पर कब चलना है, कहां रुकना है, इसलिए गिरते नहीं हैं।
प्रेरणा साहनी . जयपुर | रंगमंचजहां कोई री-टेक नहीं होता, गलतियाें को सुधारने का कोई दूसरा मौका नहीं मिलता। इसी मंच पर अगर दृष्टिबाधित बच्चे अभिनय करते दिखें तो....वह भी पूरी दक्षता के साथ। जयपुर के नाट्यकुलम के 78 वर्षीय भारतर| भार्गव पिछले डेढ़ साल से ऐसे ही बच्चों को अभिनय सिखा रहे हैं। भंगिमाएं सिखाने में दिक्कत आती है तो बच्चों के चेहरों पर अपनी अंगुलियों से ही भाव उकेर देते हैं। भारतर| की ही तरह दो और ऐसे लोग हैं जो दृष्टिबाधित बच्चों के दिलों से कमतरी का अहसास दूर कर रहे हैं। ये हैं फोटोग्राफर पद्मजा और चंदन राठौड़। दोनों दृष्टिबाधित बच्चों को फोटोग्राफी सिखा रहे हैं।
डेढ़ सालपहले मैं कुछ दृष्टिबाधित बच्चों के संपर्क में आया। वे खेल-खेल में भाव भंगिमाएं बना रहे थे। मैंने तभी ठाना कि इन्हें रंगमंच की बारीकियां सिखाऊंगा। शुरुआत की तो लोगों ने मजाक उड़ाया। कहते-जिन्हें खुद नहीं दिखता, उन्हें देखने कौन आएगा। लेकिन ये बच्चे मेरी कल्पना से भी आगे निकले। आम रंगकर्मी जो अहसास व्यक्त नहीं कर सकते, वैसा ये बच्चे कर दिखाते हैं। शायद इनका मन ही वह आंखें हैं जो सब कुछ सिखता जाता है। शुरुआत में मैं इन्हें भाव-भंगिमाएं सिखाने के लिए अंगुलियों से इनके चेहरों पर भाव उकेरता था। बच्चे स्टेज से गिर जाएं...इसके लिए संगीत की मदद ली। इन्हीं में से कुछ बच्चों को संगीत का क्लू देने में प्रशिक्षित किया। ये बच्चे पिछले डेढ़ साल में कई नाटकों का मंचन कर चुके हैं। इनमें सबसे खास प्रेमचंद की ईदगाह है। -भारतर|भार्गव