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दो साल बाद कल बैठक में तय होगी नई डीएलसी दर

7 वर्ष पहले
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बजटमें घोषणा के आधार पर दो साल बाद इस बार डीएलसी दर (सरकारी स्तर पर जमीन की वेल्यू) बढ़ाई जाएगी। सरकार के निर्देश पर 30 सितंबर को कलेक्ट्रेट सभागार में डीएलसी की मीटिंग होगी, जिसमें 10 से 15 फीसदी तक डीएलसी की दरों को बढ़ाया जाएगा। डीएलसी दर बढ़ने के साथ ही जमीन खरीदने वालों पर खर्च का बोझ बढ़ जाएगा।

जिले में दो साल पहले सरकार के आदेश पर 10 फीसदी डीएलसी दर बढ़ाई गई थी, जबकि डिस्ट्रिक लेवल कमेटी को हर तीन महीने में मीटिंग कर डीएलसी दर का रिव्यू करना होता है। मीटिंग में ही डीएलसी दर को बढ़ाने, कम करने या पुरानी दर को यथावत रखने का प्रस्ताव लिया जाता है। जिले में दो साल से डीएलसी की मीटिंग तक नहीं हुई। आखिरी मीटिंग दिसंबर 2012 को हुई थी, जिसमें मीटिंग में डीएलसी दर में 10 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई थी। विभागीय सूत्रों के मुताबिक मंगलवार को होने जा रही बैठक में 15 फीसदी तक डीएलसी दर बढ़ाई जाएगी।

मीटिंग में देरी का जनता को फायदा

दोसाल तक प्रशासन की ढिलाई के कारण डीएलसी दर नहीं बढ़ाई जा सकी। इससे सरकार को राजस्व का नुकसान हुआ। वहीं आम आदमी को कम कीमत पर रजिस्ट्री का फायदा होता रहा। समय पर डीएलसी की मीटिंग होती तो जमीन की सरकारी दर 30 फीसदी बढ़ जाती। अब सरकार के आदेश पर डीएलसी दर 10 फीसदी भी बढ़ाई जाती है, तो भी आम आदमी को फायदा हो रहा है।

दरनहीं बढ़ने से लोगों को नुकसान भी

डीएलसीदर नहीं बढ़ने से कई तरह के नुकसान भी हैं। जमीन अधिग्रहण या विवाद की स्थिति में सरकारी दर के आधार पर जमीन के मुआवजे की राशि तय की जाती है। अक्सर जमीन बाजार भाव से खरीदी जाती है, लेकिन रजिस्ट्रेशन सरकारी दर पर करवाया जाता है। ऐसे में विवाद पर रजिस्ट्रेशन के दस्तावेजों में दर्ज कीमत ही मिल पाती है।

सहमति से होती है रिवाइज

जिलालेवल कमेटी (डीएलसी) के अध्यक्ष कलेक्टर होते हैं। विधायक, प्रधान आदि इसके सदस्य होते हैं। मीटिंग से पहले सभी इलाके वार संशोधित डीएलसी दर के प्रस्ताव लेते हैं। मीटिंग में सबकी सहमति से नई दर तय की जाती है।

यह है डीएलसी दर

सरकारकी ओर से इलाके वार जमीन की अलग-अलग कीमत तय की जाती है। इसे जमीन की सरकारी वेल्यू कहा जाता है। जमीन खरीद पर इसी कीमत से स्टांप ड्यूटी रजिस्ट्री पंजीयन शुल्क तय होता है। इसके आधार पर ही मुआवजा तय होता है।

समझिए नई रेट का गणित

उदाहरणके त