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मीसा बंदियों को लोकतंत्र प्रहरी के रूप में नवाजा

5 वर्ष पहले
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आपातकाल के 40 वर्षों बाद भाजपा ने लोकतंत्र प्रहरियों के सम्मान में किया समारोह

भास्करसंवाददाता | पाली

देशमें सन 1975 के आपातकाल में जेलों में बंद रहे मीसा बंदियों डीआईआर बंदियों ने जेलयात्रा तथा कथित यातनाओं की याद ताजा की। लोढ़ा स्कूल में जयप्रकाश नारायण की 113वीं जयंती के अवसर पर पहली बार भाजपा ने इन बंदियों के लिए सम्मान समारोह आयोजित किया। इस मौके पर उप मुख्य सचेतक भाजपा जिलाध्यक्ष मदन राठौड़ ने कहा कि आपातकाल के दौरान लगाए गए प्रतिबंध की परवाह किए बगैर मीसाबंदियों ने जिले में 19 माह तक जो आंदोलन चलाया उसी का परिणाम हैं कि 1977 में देश की जनता ने केंद्र में कांग्रेस का सफाया कर दिया था। सांसद पीपी चौधरी ने कहा कि लोकतंत्र मूल अधिकारों की अंग्रेजों के जाने के बाद दुबारा महत्वांकित करने का श्रेय प्रजातंत्र के इन प्रहरियों को जाता है। विधायक ज्ञानचंद पारख मारवाड़ जंक्शन विधायक केसाराम चौधरी ने भी आपातकाल के संस्मरण सुनाए।

इस मौके पर पाली प्रधान श्रवण बंजारा, मारवाड़ जंक्शन प्रधान सुमेरसिंह कुंपावत, सुमेरपुर नगरपालिका के अध्यक्ष जोराराम कुमावत, सोजत नगरपालिका अध्यक्ष मांगीलाल चौहान, उपजिला प्रमुख नवलकिशोर रावल, नगरपरिषद उप सभापति मूलसिंह भाटी, कमल गाेयल, देसूरी पूर्व विधायक लक्ष्मी बारूपाल युवा मोर्चा जिलाध्यक्ष दिग्विजयसिंह, सुभाष त्रिवेदी, राकेश भाटी जेठमल डागा सहित कई भाजपा नेता मौजूद थे।

^13 माह से ज्यादा समय तक जेल में बिताए। प्रेस पर प्रतिबंध था, इसलिए क्रांतिकारी वैचारिकता के समाचार जनता तक पहुंचाने के लिए क्रांतिदूत अखबार निकालते थे। रमेश खांडी बर्फ बा के सहयोग से साइक्लोर स्टाइल पेपर को प्रिंटिंग स्किन पर लगाकर अखबार छापते थे। गौतमचंद यति

^मीसा के दौर में थाने में बर्बर अत्याचार के कई रूप देखे। दोनों हाथों को पीछे मोड़कर हथकड़ी लगा दी जाती थी। कानों पर खुले तार बांध दिए जाते थे। विद्यार्थियों में राष्ट्र प्रेम जगाने उन दिनों हो रहे अत्याचारों की जानकारी देने स्टीकर से लेकर पोस्टर तक लगाते थे। -विजयसिंह चांचोडी

^आपातकाल के दौर में उदयपुर में विरोध स्वरूप कार्यकर्ताओं ने शवयात्रा निकाली। कार्यकर्ता नारेबाजी कर रहे थे। तब पुलिस ने घेरा बना लिया तो कार्यकर्ताओं ने पुतला सड़क पर रख दिया। पुलिस के सामने समस्या यह हो गई कि उसका क्या किया जाए? अपने हाथों से उठाकर थाने ले जाने में भी विचित्र स्थिति पैदा हो गई थी। -विजयकृष्ण नाहर

^आपातकाल के दौर में अपनी पहचान छुपाने के लिए अपने हाथ पर लिखे नाम पर ब्लेड चला दी थी। उन दिनों मेरे खिलाफ सर्च वारंट निकला हुआ था। हाथ पर लिखे नाम से हर समय गिरफ्तार की आशंका थी। इसके चलते डॉ. सृष्टि कुमार से अनुरोध कर अपने घर पर ही ब्लेड से हाथ की चमड़ी हटवा दी। इसका हाथ पर बना निशान आज भी आपातकाल की याद दिलाता है। -मदन राठौड़, उप मुख्य सचेतक

पाली. लाेढ़ास्कूल में आयोजित लोकतंत्र प्रहरी में मंचासीन अतिथि। फोटो| भास्कर

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