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रेडियो पर भी गूंजी शायरा अजरा निकहत की शायरी

5 वर्ष पहले
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कितनीही किजिए ज़ब्ते तमन्ना में एहतियात, चेहरे से दिल की बात झलकती जरूर है..। ये अशाआर टोंक की शायरा अज़रा निकहत के हैं, जिन्होंने बड़े अदब के साथ अदबी खिदमत को अंजाम दिया है। इनकी शायरी आल इंडिया रेडियो पर कई बार प्रसारित हुई। साथ ही कई पत्र पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होती रही है। उनकी शायरी का सिलसिला अब भी जारी है। उन्होंने शायरी की हर विधा में लिखा है, लेकिन ग़जल में उनकी दिलचस्पी अधिक रही है।

एकग़म एक असर हो ये जरुरी तो नहीं,

जो इधर है वो उधर हो ये जरुरी तो नहीं।

फासले वक्त की रफ्तार बदल देते हैं,

आप को मेरी खबर हो ये जरूरी तो नहीं।

खानदानेअमीरिया से तआल्लुक रखने वाली नकहत टोंकी एक तालीम याफ्ता घराना में पैदा हुई। उनकी शादी भी शायर एवं अदीब साहबजादा इमदाद अली खां शमीम टोंकी से हुई। जिनकी भी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है।

जोहम सफर हो मुकदर, वह हम मज़ाक भी हो,

राहे हयात में ऐसा बहुत कमी से होता है।

शायरीमें अजरा निकहत ने नामवर शायर इब्ने हसन बज्मी से इस्लाह ली। उनके अशआर का मजमुआ गुले सदबर्ग के नाम से प्रकाशित भी हो चुका है।

वफादारेचमन रहने का ये इनआम क्या कम है,

बहारों में जलाया जा रहा है आशिया अपना।

मिर्जानसीम बैग का कहना है कि उनका कलाम अधिक नहीं है, लेकिन पुरअसर एवं पुख्ता है। शीघ्र ही उनकी शायरी का दीवान अमवाजे नकहत के नाम से प्रकाशित होने को हैं।

निकहतोंअनवार रानाई का उनवां हो गए,

वो पसे पर्दा रहे फिर भी नुमायां हो गए।

बज्मे हस्ती में है नामुमकिन चराग़ों का शुमार,

जाने कितने बुझ गए, कितने फरोज़ा हो गए।

शख्सियत

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