झुंझुनूं. जिले में संचालित गैर राजकीय छात्रावासों, बाल गृहों, मदरसों आदि नियमानुसार संचालित हैं अथवा नहीं, इसकी जांच की जाएगी। इसके लिए शिक्षा विभाग ने 25 टीमों का गठन किया गया है। आदेश के मुताबिक सरकारी स्कूल के प्रधानाचार्य संस्थाओं में जाकर इसकी फिजिकल जांच करेंगे। इसके लिए प्रपत्र तैयार किया गया है।
इसमें छात्रावास का विवरण, स्टाफ की स्थिति, संस्था का पंजीकरण, भौतिक संरचना, आवासियों की संख्या, अनुदान की स्थिति, दस्तावेज आदि का सत्यापन किया जाएगा। एडीईओ मनोज ढाका ने बताया कि जांच के बाद संबंधित अधिकारी को जांच रिपोर्ट जिला शिक्षा अधिकारी माध्यमिक कार्यालय में पेश करनी होगी।
जांच में तीन दिन का समय दिया गया है। रिपोर्ट आने के बाद लापरवाही बरतने वालों पर कार्रवाई की जाएगी। राज्य सरकार को भी स्थिति से अवगत कराया जाएगा। -इंद्राज सिंह, जिलाशिक्षा अधिकारी (मा.)
यूं तो खरी नहीं एक भी संस्था
शिक्षा विभाग ने जांच प्रारूप में करीब 40 बिंदुओं का उल्लेख किया है। इस प्रारूप के लिहाज से जिले में एक भी हॉस्टल या मदरसा नियमों के अनुसार संचालित नहीं है। कई बड़ी संस्थाओं में हालत इतनी खराब है कि वहां बच्चों के साथ पशु की भांति क्रूरता बरती जाती है। एक रूम में आठ से 10 तक बच्चों को रखा जाता है। इनके मनोरंजन खेलकूद का कोई बंदोबस्त नहीं होता। संस्था संचालक परिजनों को मैरिट के सपने दिखाकर बच्चों का एडमिशन कर लेते हैं। बाद में हॉस्टल में बच्चों को कैदियों के भांति रखा जाता है।
परिजन मैरिट के सपनों में खोये रहते हैं। कई बार तो हालत ऐसी हो जाती है कि परिजन भी बच्चे की पीड़ा की अनसुनी कर देते हैं। ऐसे में बच्चे या तो मौका पाकर भाग जाते हैं या फिर खुदकुशी कर लेते हैं। कई हॉस्टल में ऐसी वारदातें हो चुकी हैं लेकिन मामला ले देकर रफा-दफा कर दिया जाता है। जांच अधिकारी एक-एक पहलू की बारीकी से जांच करें तो कई और भी बड़ी खामियां उजागर हो सकती है।
निरीक्षण के बिंदु
> संस्थान का नाम
> संस्थान का पता
> पंजीकरण तिथि
> नवीनीकरण
> वर्तमान संचालन
> फोन एवं ई-मेल
> अध्यक्ष का नाम
> सचिव का नाम
> संपर्क के नंबर
> कार्यरत कर्मचारियों की सूची
> द्वार पर कर्मचारियों का उल्लेख
> गृह किशोर न्याय अधिनियम 2000 में पंजीकरण
> शयनागार
> कमरों की संख्या
> प्राथमिक उपचार कक्ष