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दो दंपतियों ने की देहदान की घोषणा

7 वर्ष पहले
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दान की प्रवृति को रोज ही नए अंदाज में देने में पाली एक नई मिसाल बन रहा है। मानव मात्र की सेवा में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी तथा रक्तदान-नेत्रदान के क्षेत्र में लगातार देश में नाम कमा रहा पाली अब देहदान के प्रति यहां के बाशिंदों में उठ रहा भावनात्मक जुड़ाव चरम पर है। अब शहर के प्रमुख औद्योगिक घराने प्रतिष्ठित परिवार जैन परिवार के बसंत संचेती तथा उनकी प|ी विजेता संचेती की मरणोपरांत देहदान करने की घोषणा ने यहां के दान से जुड़े इतिहास को स्वर्णिम बना दिया। सैकड़ों साल पहले हर नवांगतुक को एक ईंट एक रुपया भेंट करने वाले शहर ने दान-भेंट की परंपरा में नई इबारत लिख दी है।

शहर में मरणोपरांत देहदान करने की शुरुआत 2008 में हुई थी। वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. कीर्ति भाई बख्शी ने सबसे पहले देहदान करने की घोषणा की थी। उनके निधन के बाद परिजनों ने देह को जोधपुर मेडिकल कॉलेज को सौंपकर डॉ. बख्शी को अमर कर दिया था। उनकी प्रेरणा से कई जनों ने अपने संकल्प पत्र भरकर मेडिकल कॉलेज में जमा कराए थे। इसके बाद दूसरा देहदान 20 सितंबर 2013 को हाउसिंग बोर्ड में रहने वाले चंपालाल पुनमिया का किया गया था। समाजसेवा में सक्रिय संस्थानों की जागरूकता का ही परिणाम है कि औद्योगिक शहर में देहदान करने वालों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। गत महीने भी एक जैन दंपती सुमतमल सिंघवी, उनकी प|ी लक्ष्मी सिंघवी तथा एलआईसी में कार्यरत एलडीसी पीयूष शाह ने लायंस क्लब की प्रेरणा से देहदान करने का संकल्प लिया था। संचेती दंपती ने भी लायंस क्लब की प्रेरणा से ही मरणोपरांत देहदान का संकल्प लेकर इस अभियान को आगे बढ़ाया है।

ऐसे कर सकते हैं देहदान

देहदान बनाता है बेहतर डॉक्टर

मेडिकलकॉलेजों में डॉक्टर बनने वाला प्रत्येक छात्र मानव शरीर को अंदर से देखकर ही प्रैक्टिकल सीखते हैं। मेडिकल कॉलेज में प्रैक्टिकल करने के लिए भी कई सीनियर सर्जन्स आते हैं। मेडिकल Ÿ\\\'परेशन में जब भी कोई नई तकनीक आती हैं, तो उसे सीखने और पै्रक्टिकल कर देखने के लिए कडैवेरिक वर्कशॉप (मानव शरीर पर प्रयोग) के लिए भी बॉडी का उपयोग किया जाता है।

नहींतो जानवरों का होता इस्तेमाल

मानवशरीर मिलने की स्थिति में कई डॉक्टर जटिल ऑपरेशन करने से पहले जानवरों के मृत शरीर पर भी प्रैक्टिकल करते हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं। जब जोधपुर संभाग के कई डॉक्टरों ने मुंबई और दिल्ली जाकर जान