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शहर को आई हॉस्पिटल देने रिटायर्ड प्रोफेसर ने बेच दिया मकान-जमीन

6 वर्ष पहले
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पाली। अपनी पत्नी की स्मृति में लगाए नेत्र चिकित्सा शिविर में चयनित मरीजों की ऑपरेशन के लिए शहर से बाहर जाने-आने में तकलीफ देख जालोर में एक रिटायर्ड प्रोफेसर ने अपनी जीवनभर की कमाई आई हॉस्पिटल के लिए समर्पित कर दी।
कृषि विश्वविद्यालय, उदयपुर से रिटायर्ड 83 वर्षीय प्रोफेसर जालोर निवासी डाॅ. मोहनलाल बोहरा अब वहां एक करोड़ की लागत से शहरवासियों की सुविधा के लिए आई हॉस्पिटल बना रहे हैं। इसके लिए उन्होंने मकान पॉश कॉलोनी स्थित 1 भूखंड भी बेच दिया।

अबखुद किराए के मकान में रहकर पेंशन से जीवनयापन कर रहे हैं। पेंशन से जोड़ी गई ज्यादातर राशि भी भी वे अस्पताल के लिए दे चुके हैं। सांफाड़ा रोड पर हॉस्पिटल का शिलान्यास तो बीते साल 8 दिसंबर को ही हो गया था। लेकिन जमीन की टेस्टिंग रिपोर्ट अब मिली है। अब इस हॉस्पिटल का निर्माण होगा।

जर्मन सहित कई भाषाओं विषयों का ज्ञान

डाॅ.बोहरा जर्मन भाषा का भी गहन अध्ययन कर चुके हैं। आध्यात्मिक विचारधारा वाले डॉ. बोहरा की फिजिक्स के अलावा एस्ट्रोनॉमी एस्ट्रोलॉजी में भी अच्छी खासी पकड़ है। इन विषयों पर उनके लिखे कई आलेख गूगल तथा हेमिल्टन यूनिवर्सिटी के एस्ट्रोलॉजिकल जनरल पब्लिकेशन में उपलब्ध हैं।

बेटीकी शादी कर दी, भरा-पूरा परिवार

डॉ.बोहरा की पत्नी शांतिदेवी का निधन डेढ़ साल पहले ही हुआ है। एकमात्र बेटी की शादी भी जयपुर में हुई है। कुल छह भाई थे जिनमें दो का निधन हो चुका है। उनके भाई इंजीनियर ग्रेनाइट व्यवसायी धनपत बोहरा ने बताया कि भाईसाहब बचपन से ही दार्शनिक विचारधारा के हैं।
हम जब कभी भी सपरिवार कहीं घूमने जाते तो पूरा परिवार नेचुरल स्पॉट पर एन्जॉय करता। भाई साहब किसी मंदिर या ऐतिहासिक स्थल को निहारते रहते। हम उनसे पूछते तो हंसकर यही कहते कि दुनिया में कितने महान लोग हुए, मगर गए सब खाली हाथ। जीवन का अंतिम सच यही है।

जालोर में सांफाड़ा रोड स्थित वह स्थान जहां पर नेत्र चिकित्सालय बनना है। इनसेट में अस्पताल का नक्शा।

शिक्षा बनी सेवा का माध्यम साइकिल पर गुजार दिया जीवन

1971में बोहरा ने ग्रेविटेशन एंड जनरल रिलेटिविटी इक्विेशन पर शोधपत्र तैयार कर प्रस्तुत किया, जिस पर उन्हें पीएचडी की डिग्री मिली। इससे पहले वर्ष 1952 में एमएससी की डिग्री लेने के बाद उन्होंने उदयपुर के एग्रीकल्चर कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर पद पर नौकरी ज्वॉइन की। वर्ष 1995 में बोहरा रिटायर होकर जालोर गए।
डॉ. बोहरा का जीवन हमेशा सादगीपूर्ण रहा। यहां तक कि डॉ. बोहरा कॉलेज भी साइकिल पर ही जाते थे। कभी स्कूटर या कार नहीं खरीदी।

इंस्पायरिग स्टोरी

मरीजों की परेशानी की देख जालोर के 83 वर्षीय प्रोफेसर डॉ. मोहनलाल बोहरा ने लिया निर्णय, अब खुद रह रहे किराए के मकान में, पेंशन के अलावा मकान और भूखंड बेचकर करीब एक करोड़ की लागत से बनवा रहे आई हॉस्पिटल

75 फीसदी फ्री इलाज

अस्पताल का संचालन डॉ. बोहरा के पिता भाई के नाम से बना फतेह कल्याण ट्रस्ट करेगा। जिम्मेदारी ब्रह्मकुमारी संस्थान के ग्लोबल हॉस्पिटल को सौंपी गई है। यहां जांच ऑपरेशन की सभी सुविधाएं होंगी। डॉक्टर स्टाफ की जिम्मेदारी उसकी ही होगी। 75 फीसदी मरीजों का निशुल्क उपचार होगा। सिर्फ उन्हीं से रियायती शुल्क वसूला जाएगा जो सक्षम हैं।

अपने निर्णय से भाइयों को अवगत करवाया। सब साथ आए। जिस मकान में रह रहे थे उसे बेचा। खुद के नाम एक भूखंड और था, उसे भी बेचा। दोनों से लगभग 80 लाख रुपए आए। इसके अलावा खुद के पास जमा पूंजी भी सौंप दी। इससे दो बीघा जमीन खरीदी। यहां 30 बेड का अस्पताल भवन जांच मशीनें लगाई जाएंगी। पूरे प्रोजेक्ट पर करीब 1 करोड़ रुपए खर्च होंगे।

लोगों की तकलीफ देखी

डेढ़साल पहले उनकी प|ी शांति देवी का निधन हुआ था। छह माह बाद उन्होंने उनकी स्मृति में नेत्र चिकित्सा शिविर आयोजित किया। करीब 700 मरीज आए। ऑपरेशन के लिए कई मरीजों को बस से माउंट के ग्लोबल हॉस्पिटल ले जाया गया। उनके आने-जाने की तकलीफ देख, जालोर में ही सभी सुविधायुक्त हॉस्पिटल बनाने का निर्णय लिया।