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आज की छोटी दयालुता कल दान का पेड़ बन सकता है
बहुत ज्यादा राशि नहीं है 40 हजार रुपए। क्योंकि वर्तमान समय में इससे एक हाई एंड स्मार्टफोन भी नहीं खरीदा जा सकता। यह इतनी बड़ी राशि भी नहीं है कि घर का खर्च कुछ हफ्तों तक चलाया जा सके। लेकिन यह राशि एक स्कूल के बच्चों के लिए टॉफी खरीदने के लिए पर्याप्त है। या फिर उनके पॉकेट मनी से बचाई गई यह राशि उन परिवारों के बच्चों के लिए पर्याप्त है जिसके पिता माइनस 30 डिग्री तापमान में सैकड़ों किलोमीटर दूर सीमा पर दुश्मनों से देश की रक्षा कर रहे हैं। जब छोटे-छोटे बच्चों ने खुद जमा की गई इस राशि को राजक्का पाटिल और उनकी बेटी रुपाली को दिया तो वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें भर आईं।
यह महिला और लड़की हवलदार तुकाराम विठोबा पाटिल की विधवा और बेटी हैं। उनके पिता 31 साल पहले सियाचिन में लापता हो गए थे। उनका शरीर इसी अक्टूबर में सेना के जवानों को मिला। शहीद को श्रद्धांजलि और परिवार की मदद करने के लिए यह रकम पुणे के दो स्कूलों-अहिल्याबाई विद्यालय और आदर्श स्कूल के छात्रों ने अपने जेब खर्च से निकाली। बेहद भावनात्मक क्षण में छात्रों ने शहीद की विधवा और उनके बच्चों के लिए स्वागत और अभिनंदन समारोह का आयोजन किया। अभिनंदन इसलिए क्योंकि राजक्का ने अपने बच्चों को पाल-पोषकर बड़ा किया। उसके दोनों बच्चे आज बतौर प्रोफेशनल नौकरी कर रहे हैं तीसरा बच्चा इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है।
दुर्भाग्य से इस साल दीवाली के मौके पर परिवार के लिए बुरी खबर आई। बहादुर पिता और पति को देखने की उनकी उम्मीद खत्म हो गई। लेकिन इनका परिवार कभी गरीबी और बुरी हालात से नहीं गुजरा क्योंकि फौजी की तरह ही इन्होंने संघर्ष किया और लड़ाई जीती। संपदा सहकारी बैंक की तरफ से भी मदद की गई। बैंक ने बच्चों की शिक्षा पूरी होने तक दो साल तक कुछ पैसे दिए। मराठी बिल्डर्स एसोसिएशन भी आगे आया उन्होंने जर्जर हालत में पहुंचे उनके घर की मरम्मत की।
याद आता है कि कैसे राजक्का विधवा पेंशन पर अपना खर्च चला रही थी। एक बार भी उन्होंने अपने शौक पूरे नहीं किए। क्योंकि उनके फौजी पति सेना के मेघदूत ऑपरेशन के दौरान लापता हो गए थे। तुकाराम को 1999 में शहीद घोषित कर दिया गया था। तुकाराम के भाई नारायण भी उसी इलाके में 1988 में लापता हुए थे। साल दर साल पेंशन बढ़ती गई। आज 20 हजार रु. प्रति माह है। इतनी कम रकम के बावजूद राजक्का ने अपने तीनों बच्चों को पढ़