आधुनिक तकनीक पर बने छठे ट्रीटमेंट प्लांट के हालात भी खराब
शहरकी फैक्ट्रियों से निकलने वाले रंगीन पानी को ट्रीट करने के लिए सीईटीपी ट्रस्ट द्वारा फिलहाल संचालित किए जा रहे छह में तीनों ट्रीटमेंट प्लांटों की सैंपल रिपोर्ट भी काफी चौंकाने वाली है। नवनिर्मित ट्रीटमेंट प्लांट संख्या-6 समेत प्लांट 2 4 केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल के निर्धारित मानक पर रसायनयुक्त पानी को ट्रीट करने में विफल साबित हो रहे हैं। राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण मंडल की तरफ से 8 9 जनवरी को पाली के इन तीनों ट्रीटमेंट प्लांटों के आउटलेट से उपचारित पानी के सैंपल लिए गए थे।
निरीक्षण के दौरान तीन ही ट्रीटमेंट प्लांट संचालित थे जबकि 1, 3 5 बंद थे। हाल ही में जारी जांच रिपोर्ट में कोई भी प्लांट तय पैरामीटर्स पर खरा नहीं उतरा है। जबकि ट्रीटमेंट 6 को अत्याधुनिक टर्सरी तकनीक से बनाने का दावा किया गया था। सीईटीपी ने इसके लिए यह भी दावा किया गया था कि इससे ट्रीटमेंट के बाद डिस्चार्ज पानी कलरलेस भी होगा और मानकों पर भी खरा उतरेगा। शेष| पेज 15
ऐसेमें इन प्लांटों की उपयोगिता पर एक बार फिर सवाल खड़ा हो गया है।
जानकारी के अनुसार फिलहाल शहर में करीब 600 से अधिक रंगाई-छपाई की इकाइयों से निकलने वाले रंगीन पानी को ट्रीट करने के लिए 36 एमएलडी क्षमता के 3 प्लांट ही संचालित किए जा रहे हैं। इन प्लांटों का संचालन पाली जल प्रदूषण नियंत्रण परिशोधन एवं अनुसंधान फाउंडेशन (सीईटीपी) की तरफ से किया जा रहा है। प्लांटों का संचालन पाली पहुंचने वाले ग्रे कपड़े(कच्चा माल) पर सेस कर के रूप में वसूली कर किया जा रहा है। इन प्लांटों से गत 9 जनवरी को प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अधिकारियों ने आउटलेट से रंगीन पानी के सैंपल लिए थे। इन तीनों प्लांटों की रिपोर्ट में एक भी ट्रीटमेंट प्लांट निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतर रहे।
पूर्व में वन, पशुपालन कृषि विभाग भी बता चुके ट्रीटमेंट प्लांटों से छोड़े जा रहे पानी को जहरीला
पूर्व में भी कृषि विभाग वन विभाग अपनी रिपोर्ट में जिला प्रशासन राज्य सरकार को चेता चुके हैं कि प्लांटों से ट्रीट होने के बाद निकलने वाला रंगीन पेड़-पौधों के लिए भी जहर से कम नहीं है। साथ ही पशुपालन विभाग ने भी अपनी रिपोर्ट में इस पानी के सेवन से पशुओं में बांझपन की बीमारी फैल रही है।
नवनिर्मित प्लांट-6 को लेकर खूब दावे, मगर दूसरी रिपोर्ट में फिर फेल
सीईटीपी ने ट्रीटमेंट प्लांट-6 को लेकर खूब दावे किए गए थे। इस प्लांट को राज्य का पहला टर्सरी तकनीक का ट्रीटमेंट प्लांट बताया था। यह भी कहा गया कि इसमें ट्रीट होकर छोड़े जाने वाला पानी रंगहीन होगा, मगर इस प्लांट के शुरू होने के बाद जारी हुई दूसरी सैंपल रिपोर्ट में पेाल खुल गई है। इस प्लांट की हालत भी बहुत खराब है।
ऑक्सीजनडिमांड (मिली प्रति लीटर)
उपचारितपानी की टीडीएस का मानक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की गाइड लाइन के अनुसार 2100 मानक है, जबकि ट्रीटमेंट प्लांटों से पानी को ट्रीट करने के बाद भी 4700 से लेकर 6400 तक जा रहा है। ऑक्सीजन डिमांड निर्धारित मानक पर नहीं होने के कारण जलचरों के लिए यह पानी जहर के समान है। इससे वे लगातार मर रहे हैं। गत दिनाें नेहड़ा बांध में ऐसा पानी आने के कारण हजारों मछलियां मर गई थी। मत्स्य विभाग की रिपोर्ट में मछलियों के मरने का कारण प्रदूषित पानी को माना था।
अब तक सिर्फ नोटिस चेतावनी देकर जिम्मेदारी पूरी कर रहा प्रदूषण बोर्ड
- 30 जुलाई 2013 को प्लांटों के मानक पर नहीं चलने पर आरपीसीबी ने की थी प्लांटों की कंसेंट निरस्त करने की सिफारिश
-28 मार्च 14 को बोर्ड के सदस्य सचिव ने भी सीईटीपी को नोटिस जारी कर कंसेंट रिफ्यूज करने की दी थी चेतावनी
-30 मार्च 14 को प्लांट 1,2 3 की कंसेंट-टू-ऑपरेट की अवधि समाप्त हो गई थी
28 अप्रैल 14 को बोर्ड ने सशर्त जारी की थी तीनों प्लांटों की कंसेंट-टू-ऑपरेट
- इसके बाद भी अब तक 7 बार नोटिस जारी किए गए, मगर अब तक एक भी रिपोर्ट खरी नहीं उतरी
^ बोर्ड जिला प्रशासन प्रदूषण को लेकर मात्र बैठकें लेकर निर्देश जारी कर रहा है, जबकि इन प्लांटों की कंसेंट-टू-ऑपरेट की निरस्त करनी चाहिए। -महावीरसिंह सुकरलाई, महामंत्री, किसान पर्यावरण संघर्ष समिति, पाली
ठेकेदार के साथ सीईटीपी जिम्मेदार, जब प्लांट ही सही नहीं चल रहे तो करोड़ों का भुगतान क्यों?
ट्रीटमेंटप्लांटों के संचालन पर प्रति महीने करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। यह पैसा सेसकर से चुकाया जा रहा है। ऐसे में उद्यमियों को भी समझ में नहीं रहा है कि वे प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर प्रतिदिन सेसकर चुकाकर सीईटीपी को पैसा दे रहे हैं। सीईटीपी उसे सही तरीके से मैनेज करने में पूरी तरह से नाकाम साबित हो रही है। ठेकेदार को दिए गए ठेके के दौरान यह शर्त साफ तौर पर रखी थी कि अगर दो महीने में उसने पानी को निर्धारित मानक के अनुरूप ट्रीट नहीं किया तो उसका भुगतान रोका जाएगा। हकीकत ठेका देने से लेकर अब तक जारी हुई सैंपल रिपोर्ट में एक भी रिपोर्ट निर्धारित मानक के अनुरूप नहीं आई है। इसके बाद भी ठेकेदार को पूरी राशि का भुगतान किया जा रहा है। ऐसे में उद्यमी जिस उद्देश्य से पैसा दे रहे हैं। वह पैसा व्यर्थ ही जा रहा है।
सशर्त दी थी कंसेंट-टू-ऑपरेट , फिर भी सुधार नहीं
प्रदूषणनियंत्रण मंडल के सख्त निर्देशों के बाद भी यह प्लांट निर्धारित मानकों को पूरा नहीं कर पा रहे। बोर्ड ने ट्रीटमेंट प्लांटों की कंसेंट-टू-ऑपरेट जारी करने के दौरान सीईटीपी को साफ कहा था कि अगर वाटर एक्ट 1974 के तहत तय पैरामीटर्स पर अगर पानी को ट्रीट करके नहीं छोड़ा गया तो कंसेंट-टू-ऑपरेट को कभी भी रद्द किया जा सकता है।
हाल ही में जारी हुई सैंपल रिपोर्ट, एक भी सही नहीं
टीएसएस सीओडी बीओडी
मानक मानक मानक
(100)(200) (30)
प्लांट-2 288, 499 74
प्लांट-4 584 1104 180
प्लांट-6 428 848 139
(टीएसएस यानी टोटल सस्पेंडेड सॉलिड, सीओडी यानी केमिकल ऑक्सीजन डिमांड, बीओडी यानी बायोकेमिकल)