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21 साल की अपर्णा बनीं जिला प्रमुख, अभी कॉलेज में कर रही हैं पढ़ाई

6 वर्ष पहले
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सीकर. लगातार तीसरी बार सीकर को महिला जिला प्रमुख मिली हैं। शनिवार को भाजपा की अपर्णा रोलन जिला प्रमुख चुन ली गई हैं। वे 21 साल की हैं। इन्हें प्रदेश की सबसे युवा जिला प्रमुख माना जा रहा है। भाजपा 23 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत में थी।
निवार को जिला प्रमुख के चुनाव में अपर्णा ने कांग्रेस के भंवरलाल वर्मा को 12 वोटों से हराया। अपर्णा को 23 और भंवरलाल को 11 वोट मिले। माकपा के चार और एक निर्दलीय सदस्य वोट डालने ही नहीं आए। जिले की नौ पंचायत समितियों में से चार में कांग्रेस ने व चार में भाजपा ने प्रधान बनाए। एक जगह निर्दलीय विजयी रहा। फतेहपुर और धोद के परिणामों ने चौंकाया।
फतेहपुर में कांग्रेस के सदस्य ज्यादा होने के बावजूद भी भाजपा प्रधान बनाने में कामयाब हुई। धोद में कांग्रेस से चुनाव जीतने वाले ओमप्रकाश झीगर ने प्रधान का निर्दलीय चुनाव लड़ा। भाजपा के समर्थन से माकपा को हराने में सफल हुए।
उप जिला प्रमुख और उप प्रधान चुनाव आज
रविवार सुबह 11 बजे उप जिला प्रमुख व उप प्रधान चुनने की प्रक्रिया शुरू होगी। भाजपा अभी तक उप प्रमुख को लेकर किसी एक नाम पर फैसला नहीं कर पाई है। चर्चा में सुरेश शर्मा, शोभसिंह अनोखू, ताराचंद धायल और िजतेंद्रसिंह के नाम हैं। नीमकाथाना विधायक प्रेमसिंह बाजौर का कहना है कि रविवार सुबह नौ बजे होने वाली मीटिंग में इस पर फैसला होगा।
दांतारामगढ़ : चतुर्वेदी ने आकर संभाली स्थिति
दांतारामगढ़ में भाजपा समर्थक प्रधान बनने को लेकर आपस में उलझ गए। इसके बाद स्थिति संभालने के लिए जिले में पार्टी के प्रभारी मंत्री अरुण चतुर्वेदी व पूर्व जिलाध्यक्ष हरिराम रणवां को मौके पर पहुंचे।
महिला सदस्य को उठाकर ले जाने का प्रयास : पाटन में तहसील से 50 मीटर दूर कुछ लोगों ने वार्ड सात से भाजपा की महिला पंचायत समिति सदस्य को उठाकर ले जाने का प्रयास किया। वहां मौजूद लोगों ने उसे छुड़ाया।
प्रदेश की सबसे युवा जिला प्रमुख
अपर्णा रोलन प्रदेश में सबसे युवा जिला प्रमुख बनी हैं। दैनिक भास्कर ने अपर्णा के बारे में जुटाई है जानकारी, ताकि आप अपने जिलाप्रमुख को जान सकें। पढ़िए अपर्णा की ही जुबानी...
पढ़ाई - राजस्थान यूनिवर्सिटी में फाइन आर्ट की स्टूडेंट। पढ़ाई जारी रखूंगी। पेंटिंग का बहुत शौक है।
पसंद - घूमना काफी पसंद है। अिभनेताओं में अमिताभ, शाहरुख फेवरेट हैं। शाकाहारी हूं। फास्ट फूड पसंद है।
क्या कभी ऐसा सोचा था?
कभी नहीं सोचा था, जिला प्रमुख बनूंगी। किस्मत ने आज मुझे बहुत कुछ करने का मौका दिया है।
छोटी उम्र में बड़ी चुनौती कैसे स्वीकार करेंगी?
- अभी जिला परिषद को समझना होगा। बड़ा चैलेंज मिला है। स्वीकार करूंगी। सबको साथ लेकर काम करेंगे।
विपक्ष में आपसे ज्यादा अनुभवी हैं। कैसे सुनेंगी?
सबको साथ लेकर चलेंगे। वाजिब मांग को सुना जाएगा।
अपर्णा ही क्यों बनीं जिला प्रमुख?
भाजपा में जिला प्रमुख के लिए दो दावेदार थे। भाजपा के सभी विधायकों व सांसद की सहमति के बाद अपर्णा के नाम पर मुहर लगी। प्रदेश नेतृत्व व मुख्यमंत्री के यहां से इसी नाम के निर्देश मिलने से अपर्णा की राह आसान हुई।
योजनाअों के बजट से चलता है परिषद का काम
नई जिला परिषद का गठन हो गया है। चुनौती विकास की है। पंचायतराज सिस्टम चलाने वाले जनप्रतिनिधियों के कार्यों के बारे में हर कोई जानने को उत्सुक रहता है कि आखिर ये करते क्या हैं। दैनिक भास्कर बता रहा है कि जिला प्रमुख के क्या होते हैं अधिकार और कैसे आता है जिला परिषद में विकास के लिए बजट...
अधिकार
जिला प्रमुख का ग्रामीण क्षेत्र की प्रशासनिक पंचायतीराज संस्थाओं पर नियंत्रण रहता है। प्राकृतिक आपदा या जन-धन हानि में स्वविवेक से एक लाख रुपए की राशि का अधिकार । 20 हजार के ऊपर के सभी चेक पर जिला प्रमुख के हस्ताक्षर होते हैं, जिसकी अधिकतम सीमा नहीं है।
विकास का रास्ता
जिला परिषद सदस्यों को अलग से कोई बजट नहीं मिलता। जैसे विधायक, सांसद व सरपंचों को मिलता है। जिला परिषद सदस्य, पंचायतीराज विभाग की अनटाइड फंड, एसएफसी व टीएफसी-13 योजना के जरिए विकास कार्य करवा सकते हैं। अलग-अलग समिति की बैठकों में यह एजेंडे रखे जाते हैं।
यहां से आता है बजट
राज्य वित्त आयोग निर्बंध योजना में ग्राम पंचायत के विकास के लिए साल में तीन बार बजट मिलता है। मनरेगा के लिए केंद्र सरकार से हर साल पांच से छह करोड़ रुपए मिलते हैं। इसके अलावा भी कई तरह के टैक्स भी हैं।
25 बैठक होनी चाहिए। होती सिर्फ 15 से 18 हैं। तीन महीने में बुलानी चाहिए। जबकि वक्त इससे कहीं ज्यादा लग जाता है।
गांव का विकास रूक जाता है क्योंकि, बजट का ठीक से उपयोग में नहीं होता। उदाहरण के लिए पिछले कार्यकाल में टीएफसी-योजना में 3.37 करोड़ रुपए मिले। लेकिन खर्च हुए सिर्फ 3 करोड़ रुपए। इसलिए अब नए सदस्यों को मॉडल गांव वाले प्रोजेक्ट बनाने होंगे। जो पिछले कार्यकालों में नहीं हो पाए हैं।
10 फीसदी सदस्य ही ऐसे होते हैं जो बैठक में सवाल उठाते हैं। इनमें भी 70 फीसदी सवालों के नहीं मिलते जवाब।
आगे की स्लाइड में देखिए कौन कहां से जीता।