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हाथ गंवाने के बाद खुद खेले, तैयार किए 92 राष्ट्रीय खिलाड़ी
जोगेंद्रसिंह गौड़ | सीकर 9549659910
हौसलोंऔर जिंदादिली के दम पर सफलता की इबारत लिखी है मौल्यासी (सीकर) के महेश नेहरा ने। इनकी सफलता किसी फिल्मी कहानी जैसी है, लेकिन हर किसी के लिए सीखने को बहुत कुछ है। 13 साल पहले महेश का पुणे में दायां हाथ कट गया। फिर उदयपुर जाना हुआ। वहां ग्राउंड पर हम उम्रों को खेलते देखकर इच्छा जताई तो ताने देकर लौटा दिया। इन्हीं तानों को मजबूती बनाया और पैरा स्पोट्र्स से जुड़ गए। खुद एथलेटिक्स में पैरा एशियन गेम्स तक पहुंचे। इसके बाद निशक्त बच्चों का सहारा बने। अब तक इस खेल में दो इंटरनेशनल और 92 नेशनल प्लेयर अपने स्तर पर तैयार कर चुके हैं।
खुद ने 79 और इनके तैयार खिलाड़ियों ने 81 अलग-अलग मैडल हासिल किए हैं। 28 साल के महेश नेहरा बताते हैं- पारिवारिक परिस्थितियों की वजह से 2002 में पुणे की एक फैक्ट्री में नौकरी करने जाना पड़ा। कुछ ही महीने बाद मशीन में आने से दायां हाथ कट गया। इसके बाद किसी रिश्तेदार के रहने के लिए उदयपुर पहुंच गया। ग्राउंड पर खेलने गया तो ताने मिले। एकबारगी लगा कि जैसे जिंदगी बोझ बन गई है।
मित्रों-रिश्तेदारों का संबल मिला। तय कर लिया कि खेल में कुछ दिखाऊंगा। पैरा स्पोट्र्स में सफलता मिलने के बाद तय किया कि दूसरे निशक्त बच्चों को तैयार करेगा। सीकर में एकेडमी खोली और आज वहां 48 बच्चे ट्रेनिंग ले रहे हैं।
एक प्रतियोगिता के दौरान टीम के साथ सम्मानित होते नेहरा। -फाइल फोटो
महेश नेहरा
जब सामान्य के साथ दौड़े और तीसरे नंबर पर रहे | 2009में नेहरा ने सामान्य वर्ग के कॉलेज टूर्नामेंट में भाग लिया। वे तीसरे नंबर पर रहे और स्टेडियम तालियों से गूंज उठा। क्योंकि एक हाथ के नौजवान ने दौड़ में हौसला दिखाया। 2010 पैरा एशियन गेम्स चीन में 1500 मीटर की दौड़ भाग लिया। खेल के दौरान ही शारीरिक शिक्षक की डिग्री हासिल की।
नेहरा को हाथ गंवाने के बाद बीमा योजना में 3500 रुपए की पेंशन मिलने लगी। इन रुपयों का उपयोग निशक्त बच्चों को खिलाड़ी बनाने के लिए किया। मंदबुद्धि, मूकबधिर, दृष्टिहीन अन्य विकलांग श्रेणी के स्कूली बच्चों को खिलाड़ी बनाने के लिए ढूंढ़कर लाए। बच्चों को बाहर लेकर जाता तो खाना भी इनके लिए घर से बनाकर लाते थे। बच्चों को लगातार प्रेक्टिस करवाई। नतीजा रहा कि साबरमल बावरिया पैरा स्पोटर्स में नेशनल वॉलीबॉल टीम में शामिल हुआ तो भारत भाटिया को भी इंटरनेशनल खेलने का मौका मिला। फिलहाल वे सीकर के अलावा दूसरे शहरों में भी जाकर ट्रेनिंग दे रहे हैं। अब तो कई जगह से आर्थिक मदद मिलने लगी है। इनका मकसद है कि निशक्त बच्चों में हीन भावना नहीं आए।