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टिटनेस रोगी को रोशनी तेज आवाज से भी दूर रखें

7 वर्ष पहले
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सीकर. टिटनेसक्लॉस्ट्रिडियम टिटेनी नामक जीवाणु से होता है। शिशुरोग विशेषज्ञ डॉक्टर मदन सिंह फगेड़िया ने बताया कि यह रोग कभी भी जानलेवा साबित हो सकता है। इस रोग के जीवाणु मिट्टी, गंदगी, आंतों एवं पशुओं के मल में पाए जाते हैं। कटी त्वचा, घाव एवं संक्रमण द्वारा शरीर में प्रवेश कर स्नायु तंत्र को संक्रमित कर देते हैं। नवजात शिशु में यह संक्रमण कटी त्वचा नाभिनाल द्वारा होता है।

लक्षण: जीवाणुओंके शरीर में प्रवेश करने के छह से 10 दिन बाद रोग के लक्षण शुरू होते हैं। मुख्य लक्षणों में पूर्व में चोट लगने या कान में संक्रमण की शिकायत होना, मुंह खोलने में परेशानी होना, गले में ऐंठन होना गर्दन शरीर में तान आना शामिल हैं। नवजात शिशु में यह रोग जन्म के तीन से 28 दिन में होता है। शिशु के स्तनपान में परेशानी आने के साथ साथ गर्दन शरीर तन जाता है या मांस पेशियों में ऐंठन, तान झटके आने लगते हैं। जिसके कारण कई बार शिशु की मौत हो जाती है। प्रसव के बाद शिशु के नाल को गंदे हाथों गंदी ब्लेड से काटने या नाल पर गोबर या घी लगाने से शिशु में यह रोग हो जाता है। जिसे नियोनेटल टिटनेस कहते हैं।

उपचार: घावको अच्छी तरह से साफ करें। रोगी को अंधेरे कमरे में लिटाएं। रोगी को अनावश्यक रूप से स्पर्श नहीं करें। तेज रोशनी तेज आवाज से बचाएं। एंटीबायोटिक पेनिसिलिन मेट्रोनिडाजोल दें।