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हर महीने साढ़े 17 करोड़ खर्च पर एक भी सरकारी स्कूल मेरिट से बाहर

8 वर्ष पहले
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सीकर.राजस्थान बोर्ड की सीनियर सैकंडरी विज्ञान व कॉमर्स परीक्षा की मेरिट में सीकर जिले के एक भी सरकारी स्कूल का विद्यार्थी नहीं आने से शिक्षण व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। जिले के सरकारी सैकंडरी व सीनियर सैकंडरी स्कूल में हर महीने साढ़े 17 करोड़ रुपए का बजट है लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल हैं जहां लैब, विषयाध्यापकों सहित अन्य संसाधनों की भारी कमी है। शिक्षाविदों का कहना है कि रिजल्ट अच्छा अथवा खराब रहने का कॅरिअर में फर्क नहीं पड़ने और ठोस कार्रवाई नहीं होने से बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षक हैं जो पढ़ाई को लेकर गंभीर नहीं रहते। इसके लिए सरकार के स्तर पर ठोस नीति बनाने की जरूरत है। हैरानी की बात यह भी है कि जिला मेरिट में भी सरकारी स्कूल के विद्यार्थी जगह नहीं बना पाए है। कमजोर रिजल्ट देने वाले शिक्षकों पर ठोस कार्रवाई भी नहीं की जा रही। एक्सपर्ट्स की राय में मेरिट लिस्ट में एक भी सरकारी स्कूल नहीं होना मंथन का विषय है।
एनालिसिस करके बनाएंगे योजना
शिक्षा मंत्री ब्रजकिशोर शर्मा कहते हैं सामान्यतया सरकारी स्कूलों के बच्चे भी मेरिट में आते हैं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो पाया। परिणाम का एनालिसिस कर योजना बनाई जाएगी। माध्यमिक शिक्षा निदेशक वीना प्रधान कहती हैं, स्कूलों में निश्चित रूप से सुधार की जरूरत है। इस दिशा में जो प्रयास चल रहे हैं उसमें तेजी लानी होगी।
तबादलों का आकलन होना चाहिए
बार्क के एजुकेशन बजट एनालिस्ट महेंद्र सिंह बताते हैं, परिणामों का इंक्रीमेंट, तबादलों में प्रमुखता से आकलन होना चाहिए।
यह भी है बड़ी वजह
> सरकारी स्कूलों के रिजल्ट के लिए शिक्षकों के खाली पद भी जिम्मेदार हैं। परीक्षा होने के दौरान सभी पद पदोन्नति के जरिए भरे गए। इससे पहले करीब 700 पद जिले में खाली थे। बाद में भरे गए पदों का फायदा भी विद्यार्थियों को नहीं मिल पाया।
> सरकारी स्कूलों में गणित, विज्ञान व अंग्रेजी विषय पर कम फोकस किया जा रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि इसके लिए अभी तक शिक्षा कार्यालयों व स्कूल प्रिंसिपल ने कोई योजना ही नहीं बनाई।
> जिला शिक्षा अधिकारी व शिक्षक मानते हैं कि सुविधाएं नहीं मिलने के कारण अभिभावक अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भिजवाते हैं। लिहाजा, कमजोर तबके के बच्चे सरकारी स्कूलों में आते हैं।
> गांवों में सरकारी स्कूलों में टीचर लगाने के पीछे राजनीति भी चलती है। शिक्षकों को अन्य ड्यूटी में भी फंसाया जाता है।