धोद. यहां के परिणाम सबसे ज्यादा चौंकाने वाले रहे। किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि सबसे ज्यादा 11 सीटें होने के बावजूद माकपा का प्रत्याशी प्रधान का चुनाव हार जाएगा। इस हार की बड़ी वजह रही भाजपा और कांग्रेस का एक साथ आना। निर्दलीय भी इनके साथ हो गए और कांग्रेस की टिकट पर जीतकर निर्दलीय प्रधान का चुनाव लड़ रहे झीगर को जीता दिया। झीगर को 14 वोट मिले और माकपा के झाबरमल को सिर्फ 11 वोट।
यहां माकपा को 25 में से 11 सीटें मिली थी और उन्हीं का प्रधान बनना तय माना जा रहा था लेकिन माकपा दो सीटों का जुगाड़ नहीं कर पाई। माकपा को हराने के लिए भाजपा व कांग्रेस एकजुट हुए। भाजपा के पास छह और कांग्रेस के पास पांच सीटें थी। तीन निर्दलीय भी उन्हीं के साथ चले गए। कांग्रेस के झीगर ने निर्दलीय पर्चा दाखिल कर दिया और वे जीत गए। माकपा के झाबर मल ओला को 11 वोट ही मिले।
इन्हीं के नाम पर क्यों बनी सहमति?: झींगर कांग्रेस से जीत कर आए थे और वरिष्ठ नेता होने के कारण उनका नाम कांग्रेस की तरफ से तय था। भाजपा किसी भी कीमत पर माकपा को हराना चाह रही थी और झीगर पूर्व जिलाध्यक्ष हरिराम रणवां के रिश्तेदार हैं इसलिए भाजपा भी उनके नाम पर सहमत हो गई।
विधायक का चुनाव भी लड़ चुके हैं : झीगर मैट्रिक पास हैं और इनकी उम्र 62 साल हैं। दो बार जिप सदस्य व सरपंच रह चुके हैं। धोद से विधायक का चुनाव लड़ चुके हैं।
भाजपा ने कांग्रेस का साथ क्यों दिया?
भाजपा जिलाध्यक्ष झाबरसिंह खर्रा ने बताया कि रिजल्ट की रात माकपा ने गुंडागर्दी की। कभी-कभी कुछ फैसले ऐसे भी लेने पड़ते हैं जो नहीं लेने चाहिए। जहां तक पहल की बात है तो दोनों पार्टियों ने पहल की।
रणनीति के तहत नहीं दिया सिंबल
कांग्रेस जिलाध्यक्ष गोविंदसिंह डोटासरा ने बताया कि रणनीति के तहत सिंबल नहीं दिया। भाजपा के सहयोग के बारे में पूछने पर कहा कि हमारा प्रत्याशी उतारा था। वोट किस-किसने दिए, कुछ नहीं कह सकते।