सीकर। ऑफ सीजन में ताइवानी टिंडा की खेती कर रसीदपुरा के किसान गोरधन सिंह ने अपनी आमदनी कई गुना बढ़ाई है। इस तकनीक से वे हर दिन एक हजार से 1500 रुपए तक पैदावार ले रहे हैं। एक बीघा में टिंडा की फसल से किसानों को परंपरागत खेती में जहां 20 हजार रुपए की पैदावार मिलती, वहीं गोरधनसिंह 90 हजार रुपए तक की पैदावार ले रहे हैं। फसल को सर्दी से बचाव के लिए नुनवुन विधि के साथ मल्च व बूंद-बूंद सिंचाई तकनीक अपना रहे हैं।
गोरधनसिंह दो साल से कर रहे हैं नवाचार
किसान गोरधन सिंह का कहना है कि वह इस विधि को अपनाकर दो साल से टिंडा की खेती कर रहे हैं। फिलहाल सात बीघा में ताइवानी टिंडा की फसल लगा रखी है। इससे उत्पादन शुरू होने के साथ ही हर दिन तीन से चार क्विंटल तक पैदावार मिल रही है। ऑफ सीजन फसल होने की वजह से मार्केट में टिंडा के भाव 25 से 30 रुपए किलो तक बोले जा रहे हैं। ऐसे में उन्हें हर दिन आठ से साढ़े आठ हजार रुपए तक पैदावार मिल रही है।
यूं ली जाती फसल : ताइवानी टिंडा की बुआई के लिए खेत में सबसे पहले बूंद-बूंद सिंचाई के लिए मिट्टी के बैड बनाए जाते हैं। बैड पर फसल बुआई से पहले प्लास्टिक मलचिंग की जाती है। वहीं फसल अंकुरण के साथ ही सर्दी से बचाव के लिए नुनवुन लगाया जाता है। उद्यान विभाग के सहायक निदेशक बीएस यादव का कहना है कि टिंडा की खेती में किसान के द्वारा अपनाई जा रही विधि ऑफ सीजन फसल के लिए कारगर है। इस विधि में कम खर्चा और जैविक सब्जियों का उत्पादन लिया जा सकता है।
पानी की बचत के साथ कीटनाशक की जरूरत भी नहीं : इस विधि में पानी की बचत तो होती है। साथ ही फसल ढकी हुई रहने की वजह से कीट रोग भी नहीं होते। मिट्टी के बैड होने की वजह से गोबर के खाद से ही फसल तैयार हो जाती है। इस विधि में नुनवुन (फसल को ढंकने की प्लास्टिक की चद्द्र) की लागत आती है तो किसान को कीटनाशक एवं रासायनिक उर्वरकों का खर्चा नहीं करना होता।
(फोटो- रसीदपुरा में ऑफ सीजन में ताइवानी टिंडा की फसल की तैयारी करते गोरधनसिंह)