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अब चाय वाले की बेटी ने एशियाड में पदक जीतकर बढाया देश का मान

7 वर्ष पहले
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(फाइनल के दौरान हैमर थ्रो करतीं मंजूबाला।)
जयपुर. 17वें एशियन गेम्स में राजस्थान के खिलाड़ियों का दमदार प्रदर्शन जारी है। इंचियोन में रविवार को राजस्थान का नाम रोशन किया चूरू की मंजूबाला ने। उन्होंने महिलाओं की हैमर थ्रो स्पर्द्धा में कांस्य पदक जीता। चूरू जिले के राजगढ़ तहसील में चांदगोठी गांव की मंजू का यह पहला एशियाड है और पहली ही बार में उन्होंने देश के लिए पदक जीत लिया। उन्होंने 60.47 मीटर दूर हैमर फेंका। चीन की झांग वेनजियू (77.33 मीटर) ने स्वर्ण पदक तथा वान झेंग (74.16 मीटर) ने रजत पदक जीता। चाय की दुकान चलाने वाले विजय सिंह ने कर्ज लेकर बेटी को खिलाड़ी बनाया।
पड़ोसी की दुकान पर टीवी पर बेटी का फाइनल मुकाबला देखा
मेरे घर तो जैसे आज ही दिवाली आ गई है। सुबह पास की मेडिकल स्टोर पर टीवी पर मंजू का फाइनल देखा था। जब उसने पदक जीता, तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। खूब पटाखे छोड़े और मिठाइयां बांटी। गांव वाले भी खुशी में शरीक हुए। यह कहना है मंजूबाला के पिता विजय सिंह का। भास्कर से विशेष बातचीत में विजय ने कहा कि मंजू की सफलता में मेरे से ज्यादा उसकी मां को याेगदान रहा। उसकी मां पढ़ी-लिखी नहीं है, इसके बावजूद मंजू को हमेशा प्रोत्साहित किया। सच कहूं, तो एक मां ही बेटी को बाहर भेज सकती है, पिता में ऐसा साहस नहीं होता।

विजय सिंह ने बताया कि चांदगोठी गांव के बस स्टैंड पर मेरी चाय की दुकान है। बस उसी से घर का खर्चा चलता है। मंजू की दो छोटी बहन भी खिलाड़ी है। दो छोटे भाई भी खेल में ही कॅरिअर बनाना चाहते हैं। उन्होंने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया कि कई बार ऐसा हुआ, जब मंजू को टूर्नामेंट या ट्रेनिंग में भेजने के लिए गांववालों से ही उधार पैसे लेने पड़े। दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले भी उसकी ट्रेनिंग के लिए पैसे उधार लिए। मुझे उसका अफसोस नहीं है, क्योंकि बेटी ने ऐसा काम कर दिया, जिसके सामने यह कर्ज कुछ भी नहीं है।
वॉलीबॉल से शुरू किया था कॅरिअर

विजय सिंह ने बताया कि मंजू ने वॉलीबॉल से अपना खेल कॅरिअर शुरू किया था। वे जूनियर स्टेट खेली हुई हैं। नौवीं क्लास में उन्होंने वॉलीबॉल के साथ ही शॉटपुट भी खेलना शुरू कर दिया था। इस दौरान वे एक टूर्नामेंट के सिलसिले में बाहर गईं। वहां पर पहली बार हैमर थ्रो देखा। घर आकर बोली कि अब मैं हैमर थ्रो खेलना चाहती हूं। बस यहां से वे इसी इवेंट में आगे बढ़ती गईं। 2012 में मंजू की रेलवे में नौकरी लग गई और दो साल पहले उसकी शादी भी कर दी। विजय के अनुसार सेना में कार्यरत मंजू के पति राकेश कुमार ने भी उसका काफी हौसला अफजाई किया, इसकी कारण शादी के बाद भी वे खेल रही हैं।