उदयपुर. राज्य के जनजाति क्षेत्रों में त्वरित सिंचाई योजना के अंतर्गत बगैर मांगे दिए गए 14 करोड़ 17 लाख रुपए का हिसाब देने पर केंद्र सरकार के जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय ने पिछले चार सालों में अनुदान देना बंद कर दिया। पहली किस्त में प्राप्त अनुदान का हिसाब मंत्रालय को दे दिया जाता तो 400 करोड़ की सहायता राशि से राजस्थान को वंचित होना पड़ता।
यह खुलासा आरटीआई में हुआ है। केंद्र के निर्देश थे कि इस राशि का उपयोगिता प्रमाण पत्र देने पर ही प्रतिवर्ष 100 करोड़ रुपए लघु सिंचाई क्षेत्रोें में त्वरित सिंचाई के लिए दिए जाएंगे। 2010 से 2014 तक 400 करोड़ के बजाए कोई राशि राजस्थान के जल संसाधन विभाग को नहीं दी गई।
राजस्थान ट्राइबल विकास समिति के अध्यक्ष गोपीराम अग्रवाल ने सूचना का अधिकार के तहत केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय को पत्र लिखकर राजस्थान के जनजाति क्षेत्र का एआईबीपी स्कीम के तहत अनुदान रोकने की वजह स्पष्ट करने को कहा।
मंत्रालय के मुख्य सूचना अधिकारी अनिल कुमार ने लिखित जवाब में बताया कि राजस्थान के जल संसाधन विभाग ने पिछले चार सालों में कई बार मांगने के दौरान 14 करोड़ 17 लाख के उपयोग का हिसाब नहीं दिया। राज्य जल संसाधन विभाग के सहायक राज्य लोक सूचना अधिकारी अनिल कुमार अस्थाना ने सूचना के अधिकार में अग्रवाल को जवाब भेजा कि केंद्र से आबंटित राशि के उपयोगिता प्रमाण पत्र यथा समय भेज दिया गया था।
मंत्रालय ने 2009-10 में राजस्थान के जनजाति क्षेत्र उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर तथा प्रतापगढ़ और सहरिया आदिवासी क्षेत्र जिला बारां में त्वरित सिंचाई योजनाओं के लिए 14.17 करोड़ की पहली किस्त राज्य सरकार को दी थी। एआईबीपी स्कीम के नाम से यह अनुदान राशि 7 सिंचाई परियोजनाओं के विकास के लिए दी गई थी। तब राज्य के जल संसाधन विभाग को स्पष्ट कर दिया था कि उन्हें पहली किस्त बगैर मांगे दी गई है।