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सेमिनार : स्ट्रोक में 6 से 8 घंटे के बीच उपचार मिले तो बच सकता है मरीज

7 वर्ष पहले
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उदयपुर. स्ट्रोक के उपचार में मरीज के प्रारंभिक 6 से 8 घंटे बीमारी कोे रीकवर करने में काफी महत्वपूर्ण हैं। समय गुजरने के साथ-साथ मस्तिष्क की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं। लिहाजा जल्द उपचार सेे कोशिकाओं को बचाकर मरीज को बचाया जा सकता है। इस तरह की सलाह देश विदेश से आए डॉक्टर्स ने शनिवार को दीं।

जीबीएच अमेरिकन हॉस्पिटल के मस्तिष्क रोग विभाग द्वारा लकवा-पक्षाघात रोग पर एक दिवसीय सम्मेलन ‘‘6 उदयपुर कोर्स ऑन स्ट्रोक एंड न्यूरो इंटरवेंशन में ख्यातनाम डॉक्टर्स ने प्रजेंटेशन के माध्यम से जानकारी दी। एक होटल में पांच चरणों में हुए सम्मेलन में चिकित्सकों ने अनुभवों के बारे में विस्तार से बताया। प्रथम सत्र में रेडियोलोजिस्ट चिकित्सक डॉ. रणबीर, डॉ. फोरब गला, डॉ.रनबीर ने मस्तिष्क के विभिन्न भागों की इमेजिंग एमआरआई सीटी स्कैन द्वारा मिर्गी, मस्तिष्क कैंसर एवं मस्तिष्क की अन्य बीमारियों के पहचान पर प्रकाश डाला।
द्वितीय सत्र में डॉ. विक्रम हुडेड श्रीरिश हस्तक, डॉ. आनंद अलुलकर विपुल गुप्ता ने रक्त के थक्के के जमने से होने वाले स्ट्रोक पर चर्चा की। तीसरे सत्र में हॉस्पिटल के न्यूरो इंटरवेशन एवं कोर्स डायरेक्टर डॉ. अतुलाभ वाजपेयी ने मस्तिष्क की धमनियों को रक्त पहुंचाने वाली कैरोटिड आर्टी की रुकावट को स्टेंटिंग द्वारा उपचार की तकनीक पर जानकारी दी। जीबीएच मेमोरियल कैंसर हॉस्पिटल के सीईओ डॉ. आनन्द झा ने बताया कि लकवा-पक्षाघात के बारे में समाज में अनेक प्रकार की भ्रांतियां फैली हुई हैं। सम्मेलन में दिल्ली, गुडगांव, चंडीगढ़, पूना, अहमदाबाद, बेंगलुरू, मुंबई, लखनऊ, कोची, केरल एवं पटना, बिहार के कई डॉक्टर्स उपस्थित रहे।

हॉस्पिटल के सीएमडी कैंसर रोग एवं रक्त विशेषज्ञ डॉ. कीर्ति के. जैन ने कहा कि स्ट्रोक के प्रारंभिक लक्षणों जैसे कि अचानक आवाज में लडख़ड़ाहट या परिवर्तन, शरीर का कोई भाग सुन्न होना, बेहोशी, मिर्गी का दौरा या ताण, आंखों की रोशनी में कमी या धुंधलापन, तेज सरदर्द आदि हैं जिसे बिना समय गवाए समझने की जरूरत है। जो कि एक तरह का मस्तिष्क आघात है।