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\"ध्यान-स्वाध्याय से होता है विचार परिष्कार\'

7 वर्ष पहले
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श्रमणसंघीयमहामंत्री सौभाग्य मुनि ने कहा कि स्वाध्याय से मन की विचारधारा का परिष्कार किया जा सकता है। ध्यान मन को पवित्र बनाने का सर्वोत्तम साधन है। ध्यान का यह तात्पर्य है ज्ञान पूर्वक ध्यान। ज्ञान से ही शुभ-अशुभ का पता लग सकता है।

मुनिश्री पंचायती नोहरा में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारी विचारधारा वह शक्ति है, जिससे पूरे जीवन को गति मिलती है। चेतना की सर्वाधिक शक्तियां विचारधारा के निर्माण में लगी रहती है। मन के माध्यम से चेतना की अनेक विशेषताएं प्रकट होती है। जीवन के उत्थान-पतन का केन्द्र यह विचार धारा ही है। स्थानकवासी जैन श्रावक संघ अध्यक्ष वीरेंद्र डांगी ने बताया कि मुनिश्री के सानिध्य में 21 सितम्बर को चंदनबाला महिला मण्डल का राष्ट्रीय अधिवेशन पंचायती नोहरे में होगा। महामंत्री हिम्मत बड़ाला ने बताया कि अधिवेशन में देशभर की 1500 से अधिक महिलाएं शामिल होंगी।

सभी स्वर्ग पाना चाहते हैं, बनाना कोई नहीं चाहता

आयंबिल ओली का महत्व बताया

मालदास स्ट्रीट, आराधना भवन में आयंबिल ओली के आयोजन से पहले मुनि र| सागर ने प्रवचन में श्रावकों को इसका महत्व बताया। उन्होंने कहा कि भौतिक सुखों की लालसा में श्रावक नियम, कर्त्तव्य, आमना भूलता जा रह है, जिसे सुधरने की जरूरत है।

अंबामाता स्थित महावीर साधना स्वाध्याय समिति में मुनि निपुण र| विजय ने कहा कि हर व्यक्ति स्वर्ग पाना चाहता है, लेकिन स्वर्ग बनाना कोई नहीं चाहता। जिसने जीवन को ही स्वर्ग बना लिया, देवलोकगमन के बाद उन्हीं को स्वर्ग का सुख मिलता है। स्वार्थ में अंधे होकर जीते हैं तो जान लीजिए कि नरक में ही जगह मिलेगी। स्वर्ग और नरक एक व्यवस्था है। फैसला खुद को ही करना है कि जीवन स्वर्ग बने या नरक।

आत्मा दिव्य शक्ति है

थोबकी बाड़ी में आचार्य शिव सागर सुरिश्वर ऋषभ सागर ने कहा कि हर्ष, उल्लास शरीर के पोषण तक ही सीमित है। वह शरीर में अनंत चेतना ज्योति तक नहीं पहुंचता। शरीर को भोजन नहीं दिया जाए, लेकिन आत्मा को तप, त्याग और विवेक का आहार मिलता ही है। आत्मा भौतिक नहीं एक दिव्य शक्ति है।