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कुरीतियों और अत्याचार से लड़कर समाज में बदलाव लाई ये महिलाएं

7 वर्ष पहले
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प्रतापगढ़ (लोहागढ़) की 50 वर्षीय सरजू बाई। पति की मौत के बाद से परिवार वालों ने अपशगुनी मान लिया। एक साल तक घर से दिन में एक बार निकलने की अनुमति थी। शादी समारोह में जाने की मनाही थी।

संघर्ष: सरजूघर से निकली। ससुराल और समाज ने विरोध किया तो अपने नजदीकी गांव में रहने लगी। गांव की अन्य एकल महिलाओं का संगठन बनाया। समाज के सामने शर्त रखी की यदि कोई विधुर शादी नहीं करेगा तो ही विधवाएं कुरीतियों का पालन करेंगी।

बदलाव: अबगांव में किसी विधवा पर पाबंदी नहीं है। अब वे शादी समारोह में हिस्सा भी लेती हैं। घर, परिवार और समाज ने इन कुरीतियों को दूर कर दिया है।

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अब घर में कैद नहीं रहतीं महिलाएं

सरजू बाई

> कई महिलाओं को 6 माह से सामाजिक सुरक्षा पेंशन नहीं मिली है। > डाकिया 20-50 रुपए तक कमीशन मांगता है। > पालनहार योजना में नियमित भुगतान नहीं हो रहा है। > कई एकल महिलाओं के नाम बीपीएल सूची में नहीं हैं। > खाद्य सुरक्षा में राशन डीलर नियमित गेहूं नहीं देता है।