इन अभिभावकों को यकीन है कि अगर उनके बच्चे को अगले 20 या 30 साल में कोई घातक बीमारी हुई तो स्टेम सेल जीवन रक्षक बनेगी, क्याेंकि तब तक यह तकनीक भी और मजबूत हो जाएगी। ऐसे में बच्चे के अपने ही शरीर की स्टेम सेल स्टोर है तो और भी आसानी रहेगी।
भास्कर ने पिछले दिनों उदयपुर आईं चंडीगढ़ के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च की एडिशनल प्रोफेसर डॉ. इनूशा से इस तकनीक पर बातचीत की। उन्होंने बताया कि स्टेम सेल थैरेपी कैंसर, एनीमिया, थैलीसीमिया, जेनेटिक डिसऑर्डर (अनुवांशिक विकार) सहित अंगों के निष्क्रिय होने के वक्त कारगर है।
अनुमानित खर्चविभिन्न बैंक अलग-अलग स्कीम्स के साथ सेल प्रिजर्व करते हैं। कोई आजीवन करता है तो कोई 30 साल के लिए। इसमें अनुमानित खर्च 20 से 40 हजार आता है।
जानिए ये भीदेश में स्टेम सेल बैंकिंग के पांच बड़े केंद्र हैं, जो बेंगलुरू, चेन्नई, पुणे, गुड़गांव और
हैदराबाद में हैं। इनका देश के 120 शहरों में नेटवर्क है।
जानिए अंबिलिकल कॉर्ड ब्लड बैंकिंग और इसकी प्रक्रियाबच्चे के जन्म के 10 मिनट में गर्भनाल को काटकर प्लेसेंटा के ब्लड वेसल्स के खून को संरक्षित किया जाता है। नाल के 20 सेेंटीमीटर के टुकड़े कर इसके टिश्यू भी सुरक्षित करते हैं। इनका इस्तेमाल कर स्टेम सेल विकसित की जाती हैं। स्टेम सेल प्रिजर्व कराने के लिए रजिस्ट्रेशन कर किट दिया जाता है। कॉर्ड ब्लड या टिश्यू को उस किट में सुरक्षित रखा जाता है। इसे नाइट्रोजन वैपर में रखा जाता है, फिर हार्वेस्टिंग और बैंकिंग के लिए बैंक भेज दिया जाता है, जहां क्रायो प्रिजर्वेशन तकनीक के जरिए इन स्टेम सेल को स्टोर किया जाता है।
डॉक्टर्स बताते हैं कि गर्भनाल के ब्लड में ही स्टेम सेल (मूल कोशिकाओं) की मात्रा सबसे अधिक होती है। ये वे कोशिकाएं हैं, जिनमें शरीर के किसी भी अंग के रूप में विकसित होने की प्राकृतिक क्षमता होती है।