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अनाथ आश्रम की बच्चियों को अवैध कहना बंद करें, उनसे बेचारगी दिखाएं

6 वर्ष पहले
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हमारा समाज पुरुष प्रधान रहा है। वैसे भी यहां कुछ लोगों की महिलाओं लड़कियों के प्रति सोच संकीर्ण है। इस मानसिकता में परिवर्तन की जरूरत है। हर किसी को लड़के की चाहत रहती है। ऐसे में कोई महिला किसी बच्ची को गोद लेना चाहे तो इससे अच्छा अवसर और क्या हो सकता है? हमारी सोसायटी का यह ट्रेंड है कि सबका झुकाव लड़कों की तरफ ही होता है। समाज के कुछ वर्ग में लड़के की चाहत इतनी गहरी है कि अस्पतालों में बच्ची पैदा होने पर हंगामा कर देते हैं कि उनके बच्चा हुआ है और अस्पताल में उसे बदल दिया गया है। ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती रहती हैं। उम्मेद अस्पताल में कल ही ऐसा हुआ है। इससे लगता है कि समाज में यह मानसिकता काफी गहरी बैठी हुई है।

जस्टिसपीके लोहरा, याचिकापर सुनवाई के दौरान

नरेश आर्य | जोधपुर

एकबच्ची के होते दूसरी बच्ची गोद लेने की उदयपुर की अकाउंट्स ऑफिसर दर्शना गुप्ता की याचिका हाईकोर्ट ने स्वीकार कर ली है। सुनवाई करते हुए जस्टिस पीके लोहरा ने सरकारी वकील के बारे में पूछा तो बताया गया कि एडीएम सिटी की अध्यक्षता में बनी समिति ने तो बच्ची को गोद दिया है। उन्हें कोई एतराज नहीं है। फिर अतिरिक्त महाधिवक्ता एसएस लदरेचा कोर्ट में हाजिर हुए। उन्होंने भी इस मामले में कोई विरोध नहीं किया। दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस लोहरा ने अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने एक बच्ची की देखभाल की है और अब वह उसे पालना चाहती है तो इसमें बुरा क्या है? इस तरह समाज का एक वर्ग आगे आए तो अच्छा संदेश ही जाएगा। याचिकाकर्ता के वकील डॉ.सचिन आचार्य ने पैरवी करते हुए कोर्ट में ओडिशा हाईकोर्ट के एक फैसले की नजीर भी पेश की।

पुरुष प्रधान समाज में कोई महिला बच्ची गोद लेना चाहे, इससे अच्छा क्या : कोर्ट

उदयपुर में कार्यरत अकाउंट्स ऑफिसर दर्शना गुप्ता ने वर्ष 2005 में राजकीय बालिका गृह से बच्ची को गोद लिया था। बच्ची कक्षा चौथी में पढ़ रही है। दर्शना ने दूसरी बेटी की परवरिश और बेटी को बहन की चाहत में उन्होंने आठ महीने की बच्ची को गोद लिया था। आठ महीने से वे उसकी परवरिश कर रही हैं। इस बीच दर्शना ने दत्तक मां का दर्जा पाने के लिए डीजे कोर्ट के समक्ष आवेदन किया, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में अपील की थी, जिस पर गत 20 जनवरी को कोर्ट ने स्टे दे दिया था।

वक्त बदल रहा है। समाज को चाहिए कि लड़कियों को प्रोत्साहित करे। लड़कों के लिए लाइन लगाना बंद करें। अनाथ आश्रम में पल रही लड़कियों के प्रति धारणा में भी बदलाव की जरूरत है। उन्हें केवल अवैध कहना बंद करें, बल्कि उनके प्रति किसी तरह की बेचारगी भी दिखाएं। मैं कोई धर्म का काम नहीं कर रही। ये मेरी बच्चियां हैं। मैं इन पर कोई अहसान नहीं कर रही हूं। मैं बेहद खुश हूं। मुझे शुरू में जरूर इस नई पहल में दिक्कत आई, लेकिन समाज ने मुझे मां के रूप में स्वीकारा है। मेरे पापा और मेरे सभी परिजन बेहद खुश हैं। दर्शनागुप्ता, बच्ची को गोद लेने वाली अकाउंट्स ऑफिसर