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झीलों के लिए उदयपुर की याचिकाओं से बना प्राधिकरण

6 वर्ष पहले
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उदयपुर. जब शहर और प्रदेश में झीलें उपेक्षित थीं, तब इन्हें सहेजने-संवारने के लिए झील विकास प्राधिकरण स्थापना की मांग उदयपुर से ही उठी थी। लेकसिटी के जागरूक नागरिकों ने संघर्ष भी किया। हाल ही जो प्राधिकरण बना है, उसका आधार भी वे प्रमुख याचिकाएं हैं, जो उदयपुर से झीलों के संरक्षण को लेकर लगाई गई थीं। एक प्रकृति की सभी याचिकाओं को हाइकोर्ट ने 2007 में संयुक्त करने के साथ सबका फैसला किया और राजस्थान में झील विकास प्राधिकरण के गठन का आदेश राज्य सरकार को दिया। इस लिहाज से प्राधिकरण का मुख्यालय उदयपुर में शुरू करना प्रासंगिक भी है और व्यावहारिक भी। इधर, लेकसिटी के एक्टिविस्ट, झील संरक्षण समिति, झील हितैषी नागरिक मंच, झीलों के किनारे रहने वाले नागरिक तथा झील प्रेमी भी यही मांग कर रहे हैं।

2007 : सरकारद्वारा हाईकोर्ट के फैसले की पालना में राज्य में झील विकास प्राधिकरण की स्थापना करने पर 2010 में राजेंद्र राजदान वे अवमानना याचिका दर्ज कराई थी।

2009: कोर्टऑर्डर की औपचारिकता निभाने के लिए सरकार ने उदयपुर में झील संरक्षण समिति बनाई, जिसमें जन प्रतिनिधियों की सहभागिता के बिना अफसरों को शामिल किया गया। विरोध में एचआरएच ग्रुप के अरविंद सिंह मेवाड़ उद्योगपति अरविंद सिंघल ने बैठकें कर जन समर्थन जुटाया।

2012: हाईकोर्टके भय से गहलोत सरकार ने केबिनेट के जरिए प्राधिकरण का प्रस्ताव पास कराया, लेकिन जनता की राय नहीं थी। सरकार के इस निर्णय में संशोधन के लिए डाॅ. राजदान तथा अनिल मेहता ने तत्कालीन सीएस सी.के. मैथ्यू को ज्ञापन दिया। इस पर प्राधिकरण का प्रस्ताव जन सुझावों के लिए सरकार की वेबसाइट पर डाला गया। फिर ड्राफ्ट में सरकार ने आंशिक संशोधन किए। हालांकि अध्यक्ष के मामले में कोई बदलाव नहीं किया गया।

2013: दिसंबरमें वसुंधरा राजे सरकार आने के बाद मेहता राजदान ने भाजपा नेता किरीट सोमैया के जरिए संशोधन प्रस्ताव सरकार को भिजवाया। इसमें सरकार द्वारा दी गई झील की परिभाषा सुधारने तथा प्राधिकरण अध्यक्ष स्वायत्त शासन मंत्री को बनाने का विरोध किया गया। मुख्यमंत्री को प्राधिकरण चेयरमैन बनाने की मांग की गई थी।

1981 : संविधाननिर्माण समिति के सदस्य मास्टर बलवंत सिंह महता ने लेकसिटी के पेयजल स्रोत यहां की दोनों प्रमुख झीलों के संरक्षण इन्हें प्रदूषण मुक्त रखने के लिए याचिका राजस्थान हाईकोर्ट में पेश की थी।

1995: झीलसंरक्षण समिति ने प्राधिकरण गठन संबंधी एक प्रस्ताव सरकार को भेजा था।

1997: अधिवक्ताप्रवीण खंडेलवाल तथा दिनेश गुप्ता ने महता की रिट के कनेक्शन में एक और याचिका हाईकोर्ट में दाखिल कराई। इसमें भी सरकार को झीलों के संरक्षण एवं प्रबंधन का आदेश देने की गुजारिश की गई थी।

1999: एक्टिविस्टराजेंद्र राजदान ने राजस्थान हाईकोर्ट में उदयपुर की झीलों काे प्रदूषण एवं सीवरेज मुक्त रखने संबंधी रिट दायर की थी।