उदयपुर. खमनोर-हल्दीघाटी केबीच उनवास गांव में विराजित हैं। मंदिर 916 ई. में स्थापित हुआ था। लोक नृत्य गवरी की उत्पत्ति यहां से ही होना माना गया है। यहां पर्यावरण संरक्षण में महिलाओं की विशेष भूमिका रही है। अघोषित रूप से यहां आज भी पेड़ नहीं काटे जाते।
झुंझुनूं जिले के उदयपुरवाटी में शाकंभरी देवी का प्राचीन मंदिर है। शाक (फसल, उपज) देने वाली माता शाकंभरी कहलाईं। इसका उल्लेख शिव पुराण में भी आता है। देवी के प्रति किसान अगाध श्रद्धा रखते हैं। भक्तों की मान्यता है कि माता के आशीर्वाद से ही फसल की पैदावार होती है। इस मंदिर की स्थापना युधिष्ठिर ने की थी। पांडवों ने भी यहां वनवास के दौरान पूजा-अर्चना की थी।
रिछेड़ (कुंभलगढ़) में आमज माता मंदिर है। आम के पेड़ बहुतायत में होने से नाम पड़ा। अंबा माता नाम भी आम के पेड़ों से जुड़ा है। ऐसी शक्ति प्रतिमाओं में माता के कंधे पर तोता बैठा दर्शाया जाता है। दुर्गा सप्तशती में इसका उल्लेख आता है।
फतहसागर के पास पहाड़ी पर स्थापित शक्तिपीठ नीमज माता मंदिर के नाम से जाना जाता है। जानकार बताते हैं कि यूं तो नीम का पेड़ समतल जमीन पर उगता है, लेकिन पहले इस पहाड़ी पर भी नीम के पेड़ बहुतायत में थे। ऐसे में माता का नाम नीम के पेड़ से नीमज माता बना। उस समय से पहाड़ी और आसपास में नीम के पेड़ों को संरक्षण दिया जाने लगा। इस मंदिर को नीमच माता के नाम से जाना जाता है।