\"बाल शोषण संवैधानिक अधिकारों का हनन\'
न्यायाधिपति ने कहा कि हमारा संविधान बहुत मजबूत है। इससे भी मजबूत हमारे राजनीतिक दस्तावेज और नागरिक हैं। शिक्षा का अधिकार कानून 14 वर्ष तक के बच्चों की अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है। केन्द्रीय राज्य सरकारें लोक जुंबिश, सर्व शिक्षा अभियान के जरिए बाल शिक्षा की बात की जा रही है, लेकिन यह वास्तविकता से परे है। बालश्रम रोकने अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के तहत मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा-1948 तथा बाल अधिकार अधिसमय-1989 प्रमुख हैं। इन अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को लागू करने के लिए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की स्थापना की गई है। बालकों के शोषण को रोकने के लिये वर्ष 2012 में पोस्को एक्ट लागू किया गया। इसके अलावा पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत लिंग परीक्षण को गैर कानूनी घोषित किया गया। कई श्रम कानूनों में भी महिलाओं एवं बच्चों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।
और बताए कानूनी प्रावधान
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. आई.वी. त्रिवेदी ने कहा कि जनजाति क्षेत्र में बालश्रम और मानव तस्करी रोकने के लिए विधिक जागरूकता लाई जाएगी। इसके लिए विश्वविद्यालय विधिक सहायता केन्द्रों की स्थापना करेगा। लॉ कॉलेज के डीन डॉ. आनंद पालीवाल ने विधिक शिक्षा को न्यायिक शिक्षा बनाने की दिशा में कॉलेज की भूमिका बताई।
जनजाति क्षेत्र में शुरू करेंगे विधिक सहायता केंद्र
संगोष्ठी में मंचासीन न्यायाधपति माथुर (मध्य) अतिथि।
संगोष्ठी : बालसंरक्षण-विधिक पहलू विषय पर बोले न्यायाधिपति माथुर
भास्कर संवाददाता. उदयपुर
राजस्थानउच्च न्यायालय के न्यायाधीश गोविंद माथुर ने कहा कि बाल शोषण संवैधानिक अधिकारों का हनन है। संविधान और इससे जुडे कानून में कड़े प्रावधानों के बावजूद बाल अपराधों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। यह गंभीर विषय है कि मां के गर्भ में आने से लेकर जन्म लेने के उपरांत कई बच्चे समाज में शोषण से पीड़ित हैं।
न्यायाधीश माथुर शनिवार को सुखाड़िया विश्वविद्यालय के लॉ कॉलेज की ओर से एफएमएस सभागार में बाल संरक्षण-विधिक पहलू विषयक संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता संबोधित कर रहे थे। न्यायाधिपति ने कहा कि बच्चे देश का भविष्य हैं। एक बच्चा तैयार होकर यूनिफाॅर्म में बस्ता कंधों पर उठा कर स्कूल जाता है तो यह दृश्य दुनिया का सबसे सुंदर दृश्य है। बच्चों को ट्रैफिक सिग्नल पर बिना कपड़ों के भीख मा