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शहर के चारों ओर गाजर घास ने बढ़ाईं मुश्किलें

7 वर्ष पहले
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उदयपुर. एमबी अस्पताल से रिटायर्ड सीनियर फिजिशियन डॉ. विजय गोयल बताते हैं कि गाजर घास के पराग से सांस की तकलीफ हो सकती है। यह दमा रोगियों के लिए घातक है। गाजर घास से खुजली, लाल चकते हो जाते हैं। जलन के साथ आंखें लाल हो जाती हैं। गाजर घास को काटकर एकत्र रखना गलत है। गाड़ने से ही इसका निस्तारण हो सकता है।

राजस्थान कृषि महाविद्यालय के शस्य विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. रमेश चंद्र तिवारी का कहना है कि नगर निगम गाजर घास को खरीद कर किसी सोसायटी को कम्पोस्ट बनाने के लिए जगह उपलब्ध करा सकता है। इससे बनने वाली खाद का उपयोग शहर में जगह-जगह रखे गए गमलों में किया जा सकता है।

सात वर्ष पूर्व तत्कालीन सभापति रवींद्र श्रीमाली की अगुवाई में कैंपेन चलाकर प्रमुख मार्गों, सरकारी भवनों, कॉलोनियों को गाजर घास मुक्त करने का अभियान चलाया था। परिषद ने एक रुपए प्रति किलो के भाव से गाजर घास खरीदी थी। नतीजा यह रहा कि कॉलोनियों, सरकारी भवनों में लोग अभियान के साथ जुड़ते चले गए और उन क्षेत्रों को गाजर घास से मुक्त किया गया। इस काम पर 90 हजार रुपए खर्च हुए थे।

वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन में
कम्पोस्ट उत्पाद में।
बायाे गैस उत्पादन में
गाजरघास के पौधे की लुग्दी से हस्त निर्मित कागज तैयार करने में।
ईंधन के रूप में।

रेजिडेंसी स्कूल परिसर की खाली जमीन (बाएं) और स्वरूपसागर के आसपास गाजर घास घनी फैली है। यहां इसकी ऊंचाई चार से पांच फीट तक है।