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\"आत्मा में बंधे कर्मों को जीतने का पुरुषार्थ करें\'

7 वर्ष पहले
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मुनिप्रणम्य सागर ने कहा कि बीज से वृक्ष और वृक्ष से बीज बनने की व्यवस्था अनादि काल से बनी हुई है। इसी तरह आत्मा है तब से आत्मा में कर्मों के कारण राग द्वेष परिणति है। इस जन्म में आत्मा में बंधे कर्मों को जीतने का पुरुषार्थ करें।

जिस समय कर्म का उदय हो, उस समय राग द्वेष नहीं करने का पुरुषार्थ करने से ही कर्म की धारा टूटेगी। मुनिश्री मंगलवार को सर्वऋतु विलास स्थित महावीर जिनालय में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारी सफलता मन की इच्छाओं को जीतने में है। अध्यात्म कहता है जिस समय हमारे अंदर राग-द्वेषादि भाव उत्पन्न हो रहे हैं, उस समय समझ लो हम अज्ञानी है। जब कभी कर्म का उदय मंद से हो तो उस समय स्वयं के थोड़े से पुरुषार्थ से काम हो जाते है। मन दुर्बल हो यह भावना रखें। काम तथा क्रोध रहित गुरू की भक्ति नित्य मिलती रहे और मन में गुरू निंदा भाव हो ये भाव रखें। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक श्राविकाएं मौजूद थे।