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‘रूठ गया है हिंदी का पाठक, उसे मनाना होगा’
मुंबईके प्रसिद्ध कहानीकार सूरज प्रकाश ने कहा कि हिंदी का पाठक रूठ गया है, वह अब किताबें नहीं पढ़ता, उसे वापस लाना होगा। हास्य सम्मेलन में लोग आते हैं, साहित्य सम्मेलन में नहीं आते। साहित्य के पाठकों को मनाने के लिए सोश्यल मीडिया मदद कर सकता है।
साहित्यकार सूरज प्रकाश बुधवार को उदयपुर प्रवास के दौरान दैनिक भास्कर से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सोश्यल मीडिया के जितने नकारात्मक प्रभाव है, उतने ही सकारात्मक भी। अच्छे प्रभाव से सोश्यल मीडिया फ्रेंडली लोगों में साहित्य की रुचि जागृत की जा सकती है। बाजार से गायब होते साहित्य को पाठकों तक पहुंचाना होगा। रुचि बढ़ाने के लिए अच्छा साहित्य देना होगा। इसे सामान्य तौर पर नहीं आंदोलन के रूप में लेना होगा। समय के साथ साहित्य का रूप बदल रहा है। पहले सबकुछ किताबों पर ही निर्भर था, अब ई-बुक, ऑडियो बुक के साथ ही सोश्यल मीडिया भी एक जरिया बन गया है।
साहित्य को जिंदा रखेगी छोटी रचनाएं
सूरजप्रकाश ने कहा कि 1990 के बाद पैदा हुए युवाओं ने टेक्नोलॉजी ही देखी है। मनोरंजन के नाम पर नई पीढ़ी के सामने कई विकल्प है। प्राथमिकताओं में साहित्य नहीं रहा, ये चिंता की बात है। नई पीढ़ी कॅरियर, कंपीटीशन के दबाव में जी रही है। नई पीढ़ी के पास समय की कमी है, ऐसे में उसे छोटी-छोटी रचनाएं ही देनी होगी। इसी से साहित्य जिंदा रह सकता है।
तनावमुक्त मंच और मेरा गुरु है फेसबुक
फेसबुकतनाव मुक्त मंच और अभिनंदनीय ग्रंथ है। मैं तो इसे अपना गुरु मानता हूं। इसने कई पाठक दिए हैं, यह साहित्यकार को गंभीरता से सीधे पाठक से जोड़ रहा है। टिस इस बात की है कि इस ग्रंथ का कोई संपादक नहीं, ऐसे में हिंदी की गलतियां भी बहुत है, कई बार अपमान भी होता है। फेसबुक से ही रचनाकार बने लोग कुछ भी परोस रहे हैं।
सूरज प्रकाश