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कुछ लोग वक्त का सांचा बदल गए, कुछ ढांचे में ढल गए

5 वर्ष पहले
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रसभंग : देरी से आए, व्यवस्था बिगाड़ी और सबसे आगे कुर्सियां लगाकर बैठे

गजलें तैरती रहीं, दर्शक डूबते रहे

सांस्कृतिक संवाददाता | उदयपुर

गजलसम्राट जगजीत सिंह के 75वें जन्मदिवस को झीलों की नगरी ने कुछ खास तरह मनाया। शिल्पग्राम के दर्पण सभागार में सोमवार को देर रात तक जगजीतसिंह की गाई गजलों, नज्मों और कविताओं की रसगंगा बरसाई गई। कुछ खास बंद मरहूम गायक जगजीतसिंह की याद में भी पेश किए गए। कार्यक्रम का नाम दिया गया था - बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। इसमें शहर के गायक प्रेम भंडारी, देवेंद्रसिंह हिरन और पामिल मोदी ने जगजीत सिंह की गजलों की कुछ उसी अदा से पेश किया और खूब प्रशंसा बटोरी। निदा फाजली की लिखी यह गजल तो बहुत से लोग गुनगुनाते हुए बाहर निकले : कुछ लोग आए वक्त का सांचा बदल गए, कुछ लोग आए वक़्त के ढांचे में ढल गए। हालांकि श्रोता-दर्शक जगजीतसिंह की ऐसी गजलों की भी प्यास लिए बैठे रहे, जो जगजीतसिंह के कंठ में हमेशा गूंजती रहती थीं। कार्यक्रम का ताजगी भरा हिस्सा था सत्या शरण का, जिन्होंने जगजीत की लाइव विडियोज के माध्यम से इस महान गायक की दर्द भरी बेचैन कहानियां सुनाकर सबको भिगाे दिया। कार्यक्रम में जगजीत की पुरानी लाइव परफोर्मेंस, टीवी धारावाहिक मिर्जा गालिब में गाए गीतों और उनकी जिंदादिली के किस्सों को सुनकर खचाखच भरा दर्पण सभागार देर रात तक बैठा रहा। दर्शकों के उत्साह से ऐसा लग रहा था मानो जगजीत सिंह की शेष बची यादें समेट कर ले जाना चाहते हों। जगजीत के ही गाने की बोल में... हजारों ख्वाहिशें ऐसी के हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले।

जगजीत सिंह के दीवानों ने सभागार भर जाने के बावजूद बाहर खड़े होकर गजलों को सुना। जगजीत की गजलों को प्रसिद्ध गायक प्रेम भंडारी, देवेंद्रसिंह हिरन और पामिल मोदी ने अपने सुरों से दर्शकों के सामने पेश किया। जगजीत के करीबी रहे कुलदीप देसाई और सत्य शरण मुंबई से कार्यक्रम में शिरकत होने आए।

सभागार में कार्यक्रम शानदार ढंग से चल रहा था। पुलिस के एडिशनल एसपी राजेश भारद्वाज और अन्य लोग बहुत देरी से आए। पूरी व्यवस्था भंग की। ये सबसे आगे आते रहे और खड़े होते रहे। कुर्सियां लगती रहीं। रस में भंग होता रहा। आयोजक भी व्यवस्था बिगाड़ने में पीछे नहीं रहे।

तीनों गायकों ने आए हैं समझाने लोग, हैं कितने दीवाने लोग! वक्त पर काम नहीं आते हैं, ये जाने-पहचाने लोग..., दौरो हरम में चैन जो मिलता क्यों जाते मयखाने लोग! कुछ लोग आए वक्त का सांचा बदल गए, कुछ लोग आए वक्त के ढांचे में ढल गए! चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले! दर्द बढ़कर फुगां हो जाए, ये ज़मीं आसमां हो जाए! बेसबब बात बढ़ाने की जरूरत क्या है, हम ख़फ़ा कब थे मनाने की जरूरत क्या हैω रूठ जाएं तो मनाने की जरूरत क्या है, आग पानी से बुझाने की जरूरत क्या है...जैसी गजलों से समा बांधा।

जगजीत सिंह की गजलें प्रस्तुत करते देवेंद्र सिंह हिरन और प्रेम भंडारी।

जगजीत सिंह की जिंदगी के अनछुए पहलुओं को प्रस्तुत करती सत्या शरण।

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