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आत्म प्रेम ही जीवन का वास्तविक प्रेम : प्रणाम सागर

4 वर्ष पहले
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उदयपुर| जिस मनुष्य के हृदय में प्रेम नहीं उसका जीवन सफल नहीं। जहां प्रेम नहीं वहां संवादहीनता होती है और संवादहीनता के कारण श्मशान जैसी वीरानी हो जाती है। मनुष्य के मन मे जल्दी से किसी के प्रति प्रेम नहीं होता और प्रेम होता तो टिकता नहीं। लोक मे प्रायः जिसे प्रेम समझा जाता है वह प्रेम नहीं राग है और राग किसी एक व्यक्ति से होता है। प्रेम सबसे होता है यह बात शुक्रवार को नेमीनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विराजित मुनि प्रमाण सागर ने श्रावकों को संबोधित करते हुए कहे। इधर, बीसा हुमड़ भवन में आचार्य सुनील सागर ने श्रावकों को संबोधित करते हुए कहा कि आगे बढ़ने वाला किसी को बाधा नहीं पहुंचाता है। किसी को बाधा पहुंचाने वाला कभी आगे नहीं बढ़ पाता। महावीर स्वामी कहते है कि अपने विकास के लिए अपनी लकीर बढ़ाओ, किसी से तुलनाएं मत करों।

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