हृदय में 4 के बजाय थे 5 चैंबर, एक को बंद किया
एमबीअस्पतालके कार्डियोथोरेसिक सर्जन ने किशोरी के हृदय में जन्मजात बने पांचवें चैंबर को बंद कर चार चैंबर करने का दुर्लभ ऑपरेशन किया है। कोर ट्राईएट्रिया नामक बीमारी हृदय के .1 फीसदी मरीजों में पाई जाती है। कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. विनय नैथाणी ने इसे संभाग और संभवत: राज्य का पहला मामला होने का दावा किया है। कार्डियोथोरेसिक विभाग में उषा कुमारी (16) का यह ऑपरेशन हुआ। उसे सांस लेने की तकलीफ थी। थोड़ा सा चलने पर उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगती थी। उसका शरीर नीला पड़ने लगता था। जांच में पता चला कि उसे एक फेफड़ा ही था। इस तरह दो तरह की बीमारी एक साथ होने से यह मामला दुर्लभ था। करीब 4 घंटे चले ऑपरेशन में कार्डियोथोरेसिक और ऐनेस्थिसिया के डॉक्टर्स की टीम ने सफलता पाई है।
कोर ट्राईएट्रिया नामक बीमारी में फेफड़े से साफ रक्त लाने वाली हृदय के पीछे धमनी लेफ्ट ऑर्टरी के बजाय अपना अलग ही चैंबर बनाए हुए थे। जिससे मरीज के चार के बजाय पांच चैंबर हो गए थे। इससे रक्त लेफ्ट ऑर्टरी के बजाय पांचवे चैंबर में रुकता था। उसके हृदय के आधे हिस्से में रक्त प्रवाह ही नहीं हो रहा था। डॉ. नैथाणी ने बताया कि ऐसे मामलों में 100 फीसदी मृत्यु होती है।
कृत्रिम हार्ट लंग मशीन पर लेकर किया ऑपरेशन
डॉ.नैथाणी नेबताया कि यह ऑपरेशन करने के लिए डॉक्टरों की टीम पूरी तरह से कॉन्फिडेंट नहीं थी। किशोरी के माता पिता ने डॉक्टरों को विश्वास दिलाया। ऑपरेशन में सबसे पहले हृदय को हार्ट लंग मशीन पर लगाया गया। जिससे शरीर को आर्टिफिशियल सपोर्ट दिया गया। इसके बाद टीम चौथे और पांचवे चैंबर के बीच बने महीन छेद को बड़ा किया गया। कुछ देर बाद जब छेद बड़ा हो गया तो दोनों चैंबर आपस में मिलकर एक हो गए।
पहली बार टीम ने किया जटिल ऑपरेशन }डॉ. नैथाणीने बताया कि सफल ऑपरेशन पर डॉक्टरों की टीम को संशय था। इसका बड़ा कारण यह था कि इससे पहले किसी भी सदस्य ने ऐसा केस सुना था ऑपरेट किया था। इसके लिए इंटरनेट पर रिसर्च खोजकर सभी ने अपने अपने जानकार बाहर के अन्य डॉक्टर्स से केस पर डिस्कस किया। उसके बाद ऑपरेशन के तरीके पर डिस्कस कर किया गया। ऑपरेशन सफल होने के बाद अब मरीज स्वस्थ है।
उषा को यह बीमारी जन्मजात थी। उम्र बढ़ने के साथ उसे तकलीफ भी बढ़ रही थी। परिजनों ने कई अस्पतालों में दिखाया, लेकिन सही इलाज नहीं हो पाया था। जांच के लिए बच्ची का एक्सरे कराया गया। उसे एक ही फेफड़ा दिखने से संशय हुआ। ईको के बाद उसकी सीटी एंजियोग्राफी करवाई गई, जिससे लेफ्ट धमनी नहीं होने का पता चला।