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क्या पन्नाधाय ने अपने बेटे को ही उदयसिंह घोषित कर दिया था ?

Dainik Bhaskar

Jul 18, 2016, 07:06 AM IST

अपने पुत्रका बलिदान देकर विश्व इतिहास में नाम लिखवा चुकी पन्ना धाय ने क्या वास्तव में अपने पुत्र का बलिदान नहीं दिया था।

क्या पन्नाधाय ने अपने बेटे को ही उदयसिंह घोषित कर दिया था ?
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उदयपुर. अपने पुत्रका बलिदान देकर विश्व इतिहास में नाम लिखवा चुकी पन्ना धाय ने क्या वास्तव में अपने पुत्र का बलिदान नहीं दिया था। क्या पन्ना ने अपने बेटे को ही उदयसिंह घोषित करवा दिया थाω यह बात भले ही ऐतिहासिक रूप से गलत हो, लेकिन लोक विश्वासों, लोक मान्यताओं और किंवदंतियों के अनुसार आज भी यह बात जीवंत है। यह कहना है “”मेवाड़ का प्रारंभिक इतिहास’’ में डॉ. गोपाल व्यास का। इस पुस्तक का विमोचन अभी दो दिन पहले ही बीएन विश्वविद्यालय के परिसर में हुआ है। पुस्तक का प्रकाशन उदयपुर के किसी हिमांशु पब्लिकेशंस ने किया है। इतिहासविदों की नजर में यह विवादित बात है।
डॉ. व्यास ने लिखा है, लोक विश्वास, मान्यता और किंवदंती के द्वारा मैं इसका एक उदाहरण यहां प्रस्तुत करने की धृष्टता कर रहा हूं। वे लिखते हैं : जब मैं राजकीय महाविद्यालय चित्तौड़ में अध्यापन करता था। 1982 में मैं एमए के छात्रों को दुर्ग अवलोकन और इतिहास की दृष्टि से उसकी व्याख्या करने चित्तौड़ किले पर ले गया। एक ग्रामीण ने हमसे प्रश्न किया कि बालक उदयसिंह द्वितीय क्या वास्तविकता में थाω हम सभी अचंभित हुए, क्योंकि इतिहास परंपरा में पन्नाधाय द्वारा अपने पुत्र का उत्सर्ग कर तत्कालीन महाराणा बनवीर से उदयसिंह की रक्षा करना इस क्षेत्र की लोकमान्यता है।
लोकमान्यता के अपने तर्क
डॉ.व्यास ने लोकमान्यता के आधार पर वास्तविक उदयसिंह के मारे जाने और उसकी जगह पन्ना के बेटे को उदयसिंह बना दिए जाने के बारे में तर्क दिया गया है : ...महाराणा उदयसिंह के पूर्व मेवाड़ के शासक सैन्य-अग्रणी लड़ाकू वीर थे, परंतु उदयसिंह के पश्चात मेवाड़ के शासक सैन्य पृष्ठ लड़ाकू-संगठक थे। हालांकि डॉ. व्यास ने इस लोकमान्यता को इतिहासपरक नहीं, माना लेकिन इसे तर्क आधारित माना है कि पन्ना एक गडरिया यानी गुर्जर वंश से रही थी और अपने पुत्र के प्रति असीम प्रेम रखती थी। अत: उसने असली उदयसिंह की हत्या करवाने के पश्चात अपने पुत्र को उदयसिंह घोषित किया था।

लोकमान्यता के आधार पर ये भी तर्क : “”भेड़पालकगडरिया भेड़ों के झुंड के पीछे रहते आए हैं और यही रक्त-प्रकृति पन्ना के पुत्र उदयसिंह में विद्यमान रही थी।’’ लेकिन लोकमान्यता के आधार पर इस सबको तार्किक और ज्ञान की परिधि में उछलकूद करने वाला प्रश्न बताते हुए डॉ. व्यास ने लिखा है : इतिहास संकीर्ण स्रोत, विश्वास, निर्विश्लेषित परंपरा और ही मात्र भाषा और अनुवाद पर निर्भर है, अपितु इतिहास एक वैज्ञानिक अनुसंधान है, जो इतिहास की गति के साथ-साथ नवज्ञान की उपादेयता को प्रस्तुत करता है।

उदयसिंह का जूठा खाया तो उसे सांगा का असली बेटा माना
उदयपुरराज्यका इतिहास, भाग एक, लेखक गौरीशंकर हीराचंद औझा, पेज 403 में लिखा है : सन् 1537 में मेवाड़ के सरदारों ने, जिनमें कोठारिया के रावत खान, केलवा के जग्गा, बागौर के रावत सांगा आदि ने उदयसिंह को मेवाड़ का स्वामी माना और गद्दी पर बिठा दिया। उन्होंने पाली के अखेराज सोनगरा को बुलाया और दबाव बनाया कि वह अपनी बेटी का विवाह उदयसिंह से करे, लेकिन सोनगरा ने कहा : चित्तौड़ के शासक बनवीर ने वास्तविक उदयसिंह का मारा जाना और इसका कृत्रिम होना प्रसिद्ध कर रखा है। यदि आप सब सरदार इस उदयसिंह का जूठा खाएं तो मैं अपनी पुत्री का विवाह इससे कर दूंगा। अखेराज का संदेह दूर करने के लिए सभी सरदारों ने उदयसिंह का जूठा खाया। इसी पर अखेराज ने अपनी बेटी का विवाह उदयसिंह से किया।
चांदरास गांव में उदय सिंह द्वारा 451 बीघा भूमिदान का ताम्रपत्र, जो साह आसकर्ण देवपुरा को दिया, पन्नाधाय की सुरक्षा के लिए। मेवाड़ में इतने बड़े भूभाग के अनुदान का यही एक मात्र लेख है, जिस पर संवत 1621, सन 1564 ई. आसोज सुदी नवमी अंकित है।
यह बेबुनियाद बात : गुप्ता
पन्नाऔर उदयसिंह के बारे में ऐसी बातें बेबुनियाद हैं। उदयसिंह उस समय कोई दूध पीते बच्चे नहीं थे। वे दस-बारह साल के किशोर थे। उन्हें कितने ही लोगों ने देखा था। पन्ना डूंगरपुर, प्रतापगढ़ और कुंभलगढ़ गईं। सब उन्हें जानते थे। इतिहास लेखन में ऐसी किंवदंतियों का उल्लेख करना केवल अनुचित है, बल्कि यह गलत भी है। केएसगुप्ता, इतिहासकार
यह किंवदंती भी आधारहीन : जुगनू
अगरपन्ना झूठी होती तो वह कभी प्रसिद्ध नहीं होती। इसलिए यह किंवदंतियां आधारहीन हैं। पन्ना को आमेट के पास कमेरी में उदयसिंह ने जागीर दी। अगर वह उसकी असली मां होती तो वह शासक बनने के बाद उसे अपने साथ ही रखते। श्रीकृष्णजुगनू, इतिहासकार और मेवाड़ के प्रारंभिक इतिहास के लेखक

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