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अनाथ बुजुर्ग की जान बचाने वाली एमबीए छात्रा के जज्बे को सलाम

9 वर्ष पहले
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उदयपुर. उम्र तकरीबन साठ साल। तन पर एक भी कपड़ा नहीं। शुक्रवार सुबह सात बजे का वक्त। ठंड से कांपता हुआ मरणासन्न शरीर। सैकड़ों लोग एमबी कॉलेज के करीब रोड पर पड़े इस शख्स को देख चुके थे।

ज्यादातर ने तो रुकने की जहमत तक नहीं उठाई। जो रुके, वो भी चंद लम्हों के बाद निकल गए। तभी वहां से गुजर रही एमबीए की एक छात्रा रुकी। बुजुर्ग की हालत देखकर सबसे पहले वह अपने हॉस्टल से कंबल लाई।

उन्हें ओढ़ाया, फिर पास के होटल से लाकर चाय पिलाई। चार घंटे तक दर्जनों लोगों को फोन करके इस कोशिश में लगी रही किसी तरह ठंड और भूख से दम तोड़ रहे बुजुर्ग की जान बचाई जा सके।

एमबीए की इस छात्रा ने संवाददाता से आग्रह भी किया कि वह नहीं चाहती कि उसका यह कर्तव्यबोध अखबार में छपे। फिर भी क्रभास्करञ्ज किसी दूसरे जिले से आई इस जिम्मेदार छात्रा के हौसले की कहानी प्रकाशित कर रहा है, उसकी इच्छा का ध्यान रखते हुए बिना उसका नाम दिए।

छात्रा की कोशिश इसलिए अनुकरणीय है, क्योंकि वह एमबीए की पढ़ाई कर रही है। उसके पास वक्त नहीं। फिर भी सारे जरूरी काम छोड़कर उसने चार घंटे तक न केवल अनजान बुजुर्ग की सेवा की, बल्कि दर्जनों लोगों को फोन भी किए।

छात्रा ने बताया कि सबसे पहले उसने एम्बुलेंस सेवा 108 पर फोन किया। जवाब मिला कि भिखारियों के लिए एंबुलेंस सेवा नहीं है। इसके बाद उसने कई सामाजिक संगठनों, सरकारी लोगों और जान-पहचान वालों को फोन किया। राहगीरों से सामाजिक संगठनों के नम्बर मांगे।

ऐसे ही एक संगठन को जब छात्रा ने फोन किया तो उस एनजीओ ने भी अपने को असमर्थ पाया। एनजीओ चलाने वालों ने छात्रा की कोशिश में मदद करते हुए भास्कर कार्यालय में फोन किया। संवाददाता ने नारायण सेवा संस्थान से मदद का आग्रह किया।

संस्थान वालों ने अपनी एंबुलेंस बुजुर्ग को लाने के लिए भेजी। एंबुलेंस के आने के बाद छात्रा खुद बुजुर्ग को लेकर आशाधाम एनजीओ में ले गई, जहां करीब 11 बजे बुजुर्ग को नहला-धुलाकर इलाज शुरू कर दिया गया। छात्रा कहना है कि अपने इस प्रयास से उसे बहुत खुशी मिली है।