उदयपुर। पढ़ाई के लिए कड़ाके की इस ठंड में गले तक झील के पानी में उतरने के बाद नंगे पांव करीब चार किलोमीटर पहाड़ी के पथरीले-कंटीले रास्ते से रोज जोखिमभरा सफर तय करने वाले मिंदोड़ा मगरा के इन बच्चों का जज्बा किसी सैनिक से कम नहीं है। झील में मगरमच्छों का खतरा, सो अलग। इस टापू के चार से 14 साल तक के ये 46 बच्चे रोज इसी संघर्ष से रूबरू होते हुए सराड़ा के छापर थोरी गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ने आते हैं। इनमें चार-पांच साल के नन्हे बच्चे और बच्चियां भी शामिल हैं। मिंदोड़ा मगरा, एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की कृत्रिम झील जयसमंद से 18 किमी दूर गातोड़ और सेमाल पंचायत के बीच चारों ओर झील और पहाड़ियों से घिरे करेड़ी, भटवाड़ा, बाबा मगरा व पायरी जैसे चार-पांच टापूनुमा कस्बों में से एक है।
इन टापुओं में करीब सौ-सवा सौ घरों का बसेरा है। बरसात और उसके बाद के चार-पांच महीने इनके लिए बड़ी मुश्किल और संघर्ष भरे रहते हैं। पूरा इलाका पानी के ऊब-डूब में। खेत पानी-पानी। रास्ते लबालब। इन टापुओं पर रहने वाले सभी बच्चों की कहानी मिंदोड़ा मगरा के स्कूली बच्चों जैसी ही है। ये बच्चे तय समय से दो घंटे पहले घर से निकलते हैं, ताकि स्कूल जाने से पहले अपने गीले कपड़े सुखा सकें। ज्यादातर तो अपनी किताबें स्कूल में ही रखते हैं, लेकिन कभी इधर-उधर लानी पड़े तो पॉलीथिन की थैली में सिर पर रख कर पानी से निकलते हैं।
टीचर बन गांव में खोलूंगी स्कूल
इन्हीं बच्चों में एक आठवीं की छात्रा धर्मी मीणा कहती हैं- ‘पढ़ लिख कर टीचर बनूंगी। गांव में ही स्कूल खोलूंगी। हमारे गांव का एक पांच साल का बच्चा राजेश डूबते-डूबते बचा था, इसलिए मैं नहीं चाहती कि कोई बच्चा इतना जोखिम लेकर पढ़ने जाए।’
हां, नेता आते हैं ना…
पांच साल में सिर्फ एक बार-वोट मांगने : क्या कभी कोई जनप्रतिनिधि सुध लेने भी आता है? इसी गांव के रहवासी पासा भाई का जवाब…हां आते हैं ना। पांच साल में एक बार। वोट मांगने। इसके बाद नहीं। बाबूजी! यहां किसी प्रकार की नौका आदि की सुविधा नहीं है। मछली पकड़ने वाले ठेकेदारों की नावें हैं लेकिन वे भला बच्चों को लेकर क्यों जाएं। मरीजों को भी वे बड़ी मिन्नतें करने पर पार लगाते हैं। टापू पर हैंडपंप तक नहीं है। हम तो झील के किनारे भी प्यासे हैं। गांव की सरपंच शांतिलाल मीणा का कहना है कि मैं सरकार से इन बच्चों के स्कूल आने जाने की व्यवस्था करने की कई बार गुहार लगा चुकी हूं। हमारे पास इतना बजट नहीं कि हम यहां पुल बनवा दें या नावें लगा दें। सांसद अर्जुनलाल मीणा का कहना है कि ये बात सही है कि झील के मध्य टापुओं में लोग रहते हैं। मैं स्वयं जाकर देखूंगा कि वहां क्या समस्या है।
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कंटेंट : सर्वेश शर्मा, लक्ष्मण भारती फोटो: ताराचंद गवारिया