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कोई सब्जी बेचने वाली की बेटी तो किसी के पिता चलाते हैं रिक्शा, गरीबी के बावजूद ये बने स्टार

सफलता किसी की मोहताज नहीं होती। मेहनत के बल पर आगे बढ़ने वालों को कोई रुकावट नहीं रोक सकती।

Danik Bhaskar | Feb 21, 2018, 04:25 PM IST

सफलता किसी की मोहताज नहीं होती। मेहनत के बल पर आगे बढ़ने वालों को कोई रुकावट नहीं रोक सकती। ऐसी ही कुछ कहानियां हैं भारत के इन युवा खिलाड़ियों की जिनका बचपन आर्थिक तंगी और गुमनामी के अंधेरे में बीता। संसाधनों के अभाव के बावजूद सपनों को हकीकत में बदलने की जिद ने इन्हें देश के बेस्ट खिलाड़ियों की लिस्ट में शामिल कर दिया है।

जमुना बोरो: सब्जी बेचने वाली मां की बॉक्सर बेटी

बचपन में पिता की मौत के बाद जमुना की मां गुजारे के लिए सब्जी बेचने लगी। इधर, गांव के लड़कों को वुशू (मार्शल आर्ट) करते देख जमुना ने भी इस स्पोर्ट्स को अपनाने की ठानी। संसाधनों की कमी में भी जमुना ने कई टूर्नामेंट्स में एक के बाद एक अवॉर्ड जीते। आज वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुक्केबाजों में शामिल हो चुकी हैं।

रानी रामपाल रानी रामपाल

हॉकी टीम इंडिया की असली रानी

रानी रामपाल के पिता घोड़ा गाड़ी चलाते थे। उनकी माली हालत ऐसी नहीं थी कि रानी खेलने के लिए जूते, हॉकी स्टिक और बॉल जैसी चीजें खरीद पाए। लेकिन पिता से मिले सहयोग ने रानी के हौसले को टूटने नहीं दिया। आखिरकार रानी ने शाहबाद एकेडमी में दाखिला लिया। अपनी मेहनत के बल पर आज रानी देश के स्टार हॉकी खिलाड़ियों में शुमार हैं।

दीपिका कुमारी दीपिका कुमारी

पिता रिक्शा चालक, बेटी शीर्ष खिलाड़ी

 

रिक्शा चालक के यहां जन्म लेने वाली दीपिका ने शुरुआत में तीरंदाजी की प्रैक्टिस के लिए खुद धनुष बनाकर पेड़ पर लगे आमों को निशाना बनाया। 2006 में टाटा आर्चरी एकेडमी में एडमिशन के बाद पहली बार दीपिका ने आधुनिक धनुष को उठाया। अपनी मेहनत के बल पर जल्द ही वे दुनिया की नंबर एक तीरंदाज बन गईं।

पृथ्वी शॉ पृथ्वी शॉ

मुश्किलों को जवाब 

अंडर 19 क्रिकेट टीम के कप्तान पृथ्वी शॉ ने 4 साल की उम्र में अपनी मां को खो दिया था। पिता ने पृथ्वी का क्रिकेट कॅरिअर बनाने के लिए अपना बिजनेस छोड़ दिया। इस संघर्ष के बावजूद पृथ्वी आज सफल क्रिकेटर हैं। 

जैक्सन सिंह जैक्सन सिंह

गरीबी नहीं रोक पाई फुटबॉलर का रास्ता

भारतीय अंडर 17 फुटबॉल टीम के कप्तान जैक्सन सिंह ने भी संघर्षों से दो-दो हाथ किए हैं। कुछ साल पहले पिता के बीमार होने पर मां ने सब्जी बेचकर गुजारा चलाया। बचपन में पिता से फुटबॉल के टिप्स सीखकर जैक्सन ने 11 साल की उम्र में चंडीगढ़ फुटबॉल एकेडमी में दाखिला लिया था। वहां उनके अच्छेप्रदर्शन ने उन्हें कप्तानी तक पहुंचाया।