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इस गांव में हुआ था राधारानी का जन्म, आज भी पेड़ के रूप में मौजूद हैं राधा-कृष्ण

5 वर्ष पहले
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मथुरा. कान्हा के जन्म यानि जन्माष्टमी के 16 दिन बाद मथुरा में एक बार फिर उत्सव का माहौल है। यहां धूमधाम से नन्दाष्टमी मनाई जा रही है। ऐसे में dainikbhaskar.com राधारानी के जन्मस्थान के बारे में बताने जा रहा है। कृष्ण के ह्रदय में वास करने वाली राधारानी बरसाना में पली-बढ़ी थीं, लेकिन उनका जन्‍म यहां से 50 किमी दूर रावल गांव में हुआ था। मान्यता है कि यहां स्थापित मंदिर के ठीक सामने एक बगीचा है, जहां आज भी राधा-कृष्ण पेड़ के रूप में मौजूद हैं।
पेड़ स्‍वरूप में हैं राधा और श्‍याम
रावल गांव में स्थापित राधारानी के मंदिर के ठीक सामने प्राचीन बगीचा है। कहा जाता है कि यहां पर पेड़ स्‍वरूप में आज भी राधा और कृष्‍ण मौजूद हैं। यहां पर एक साथ दो पेड़ हैं। एक श्‍वेत है तो दूसरा श्‍याम रंग का। इसकी रोज पूजा होती है। मंदिर के पुजारी ललित मोहन कहते हैं कि राधा और कृष्‍ण पेड़ स्‍वरूप में आज भी यहां से यमुना जी को निहारते हैं।
कमल के फूल में मिलीं राधारानी
मान्यता है कि रावल गांव में ही राधाजी का जन्म हुआ था। मंदिर के पुजारी ललित मोहन कल्‍ला बताते हैं कि यहां करीब पांच हजार साल पहले यमुना बहती थी। शास्त्रों के अनुसार कृतिजी यमुना में स्नान करते समय पुत्र की कामना करती थीं। एक दिन पूजा करते समय यमुना से कमल का फूल प्रकट हुआ। उस फूल से रोशनी निकल रही थी और वह सोने की तरह चमक रहा था। जब कृतिजी पास जाकर देखा तो कमल का फूल पूरी तरह से खिल गया। इसमें एक नन्ही सी बच्ची थी, जिसके नेत्र बंद थे। कहा जाता है कि वह बच्ची कोई और नहीं बल्कि राधा-रानी थीं। अब उस जगह पर इस मंदिर का गर्भगृह है।
11 महीने बाद बालकृष्ण के सामने खुले नेत्र
शास्त्रों के अनुसार, राधाजी के नेत्र जन्म से लेकर करीब 11 महीने तक बंद रहे। वहीं, दूसरी तरफ मथुरा में कंस के कारागार में भगवान श्रीकृष्‍ण का जन्‍म हुआ। रातोंरात उन्हें गोकुल में नंदबाबा के घर पहुंचाया गया। कंस के डर से उस वक्त कृष्ण का जन्मोत्सव नहीं मनाया गया। 11 महीने बाद नंदबाबा ने सभी जगह संदेश भेजा और कृष्‍ण का जन्‍मोत्‍सव मनाया गया। गोकुल के राजा वृषभान जी भी बधाई लेकर गोकुल पहुंचे। उनकी गोद में राधारानी भी थीं। वहां बैठते ही राधारानी घुटने के बल चलते हुए बालकृष्ण के पास पहुंची और तभी उन्होंने अपने नेत्र खोल दिए।
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