आगरा. धर्म नगरी मथुरा और ताज नगरी आगरा में बंदरों के उत्पात की खबर के बाद राज्य सरकार ने कार्रवाई शुरू की है। अब मथुरा के बंदरों को दिल्ली भेजा जाएगा। यहां के तुगलकाबाद स्थित बंदर सेंच्यूरी में रखा जाएगा। बंदरों का उत्पात इस कदर है कि पिछले छह महीने में ही मथुरा और आगरा के 70 हजार लोगों को काट लिया। उन्हें रेबीज के टीके लेने पड़े हैं। इससे मथुरा में भगवान के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालु सबसे ज्यादा परेशान थे। गौरतलब है कि दैनिक भास्कर.कॉम ने 3 मई को इस भयावह परेशानी को उजागर किया था।
राज्य सरकार के वन्यजीव विभाग के निर्देश पर बंदरों को स्थानांतरित करने की योजना बनाई गई है। सामाजिक संस्था एमआरसी वृंदावन चैरिटेबल ट्रस्ट को यह काम सौंपा गया है। परियोजना सचिव देवेंद्र शर्मा के मुताबिक पहले तो लंगूर तैनात करने पर विचार हुआ था। लेकिन बंदरों की ज्यादा संख्या और गलियों को देखते हुए ऐसा करना नाकाफी लगगा। इसके बाद दूसरे विकल्प पर विचार हुआ। उन्होंने बताया कि जल्द ही दिल्ली के बंदर अभ्यारण्य में मथुरा के बंदरों को शिफ्ट किया जाएगा। बंदरों को उनका प्राकृतिक आवास व खानपान मिलेगा। डॉ. शर्मा ने कहा कि बंदरों को ग्रुप के हिसाब से तथा जहां ज्यादा आतंक है वहां से पकड़ा जायेगा। इसके बाद आगरा के बंदरों को शिफ्ट करने पर काम होगा।
मथुरा के बंदरों की भी गिनती हो चुकी है। प्रमुख मंदिरों के आस-पास 7000 से ज्यादा बंदर हैं। ट्रस्ट के सचिव ने बताया कि बंदर अभ्यारण्य से अनुमति मिल चुकी है। दरअसल, खासकर गर्मी की वजह से बंदर चिड़चिड़े हो गए हैं। अचानक बढ़ी गर्मी से बंदर और कुत्तों का मिजाज गरमा गया है। चिलचिलाती धूप में भोजन-पानी की समस्या हो गई है। चिड़चिड़े होकर वे शहरवासियों और श्रद्धालुओं पर पर टूट पड़े हैं। महीने भर में छह हजार से अधिक लोगों को बंदर घायल कर चुके हैं। इतने लोग एंटी रैबीज इंजेक्शन लगवा चुके हैं।
साल में दो बार प्रजनन से इसकी आबादी लगातार बढ़ती जा रही है। खाना और पानी की समस्या में बंदर घरों में घुसकर हमला कर रहे हैं। जो मरीज जिला अस्पताल में एंटी रैबीज टीके लगवा रहे हैं, उन्हीं का रिकॉर्ड मौजूद है। अस्पताल में इतने मरीज आ रहे हैं, कि अगले तीन दिनों में टीके खत्म हो जाएंगे। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट (एसेस्मेंट बर्डेन ऑफ रेबीज इन इंडिया 2004) के अनुसार आगरा में रेबीज बीमारी से वर्ष 2000 से 2004 तक 21 लोगों की मौत हुई है। इसके बाद मौत का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया।