संगम तट पर तर्पण करने जाते हुए लोग (तस्वीर में)
- संगम तट पर श्राद्ध को लेकर क्या है मान्यता
- कहां-कहां से लोग श्राद्ध के लिए आते हैं यहां
इलाहाबाद. संगम तट पर मंगलवार को पितृपक्ष के आखिरी दिन हजारों लोगों ने श्राद्ध और तर्पण किया। धार्मिक महत्व की इस नगरी में संगम तट पर स्नान और श्राद्ध का विशेष महत्व है। पितृ मुक्ति का प्रथम और मुख्य द्वार कहे जाने की वजह से यहां
पिंडदान किया जाता है।
एक पखवारे तक चले पितर पख का मंगलवार को समापन हो गया। इसकी शुरूआत नौ सितंबर को हुई थी। जिन लोगों की मृत्यु की तारीख पता नहीं है या जिनका तर्पण और श्राद्ध उनकी तिथि पर नहीं किया जा सका। ऐसा लोग प्रयाग के त्रिवेणी संगम पर मंगलवार को बड़ी तादाद में पहुंचे और पितरों को पितृ विसर्जन कर उन्हें तृप्ति प्रदान की।
मान्यता है कि
पितृ पक्ष में
पिंड दान और पितृ विसर्जन से न केवल पुरखों को तृप्ति और मुक्ति मिलती है, बल्कि पिंडदान और पितृ तर्पण करने से पुरखे खुश होते हैं और अपने परिजनों को धन-धान्य, संपदा और स्वास्थ्य का आशीर्वाद भी देते हैं।
हिन्दू धर्म के मुताबिक पिंडदान की परंपरा सिर्फ प्रयाग, काशी और गया में ही है, लेकिन पितरों के श्राद्धकर्म की शुरुआत प्रयाग में मुंडन संस्कार से होती है। पितृपक्ष की शुरुआत होते ही यहां पिंडदान और तर्पण करने वालों का आना शुरू हो जाता है।
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