फोटो: दुर्गा प्रतिमा को रंगता एक कारीगर।
गोरखपुर. जैसे-जैसे दुर्गापूजा नजदीक आ रही है, मूर्तियों को अंतिम रूप देने का काम भी जोरशोर से चल रहा है। शहर में मूर्तियां बनाने वाले ज्यादातर कारीगर कोलकाता के रहने वाले हैं। जून से शुरू हुआ मूर्ति बनाने का काम सितंबर तक चलता है। प्रतिमाओं को बनाने में उनकी कोई खास कमाई भी नहीं होती। ऐसे में कारीगर अपने बच्चों को इस पेशे में नहीं लाना चाहते। वह अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर नौकरी या व्यापार करते देखना चाहते हैं।
मूर्तिकार अशोक पाल के अनुसार, मूर्तियों को बनाने में अमूमन ढाई महीने से ज्यादा वक्त लग जाते हैं। लिहाजा कारीगरों को संबंधित शहर में ही डेरा डाले रहना पड़ता है। कारीगर अपना काम जून से ही शुरू कर देते हैं। त्यौहार के 15 दिन पहले मूर्तियों की रंगाई का काम किया जाता है। सबसे आखिर में इनकी सजावट की जाती है।
हर महीने 10 से 15 हजार रुपए की होती है बचत
कारीगर अशोक पाल और धनेश पाल ने बताया कि जरूरी खर्चों को निकालने के बाद हर महीने उनकी 10 से 15 हजार रुपए की बचत होती है। उनका कहना है कि सुबह 6 बजे से रात के 12 बजे तक पूरे दिन खड़े रहकर वे मूर्तियां बनाते हैं। इसके बाद उन्हें पंडालों तक पहुंचने के लिए तैयार करते हैं। तकरीबन 19 घंटे के काम के बदले उन्हें कुछ भी नहीं मिलता, इसलिए वे इस कारोबार में अपने बच्चों को नहीं लगाना चाहते। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी या व्यापार करें।
5 से 25 हजार रुपए की लागत से बनती है मूर्तियां
मूर्तिकार अशोक पाल के अनुसार, इस साल उन्होंने 65 दुर्गा प्रतिमाएं बनाई हैं। तकरीबन 50 से 60 लक्ष्मी प्रतिमाओं को भी वह बना रहे हैं। उनके मॉडल के अनुसार, दुर्गा प्रतिमाओं को बनाने में 8 से 25 हजार रुपए की लागत आती है। लक्ष्मी प्रतिमाओं की कीमत 4 से 10 हजार रुपए तक आती है।
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