औरंगाबाद को टेराकोटा में पहचान दिलाने में इन दलितों का भी है हाथ, अवॉर्ड पाते हैं कुम्‍हार / औरंगाबाद को टेराकोटा में पहचान दिलाने में इन दलितों का भी है हाथ, अवॉर्ड पाते हैं कुम्‍हार

यहां के कई कुम्हारों को इसी कला की वजह से सात समंदर पार जाने का मौका भी मिल चुका है।

Nov 01, 2015, 02:10 PM IST
गोरखपुर. औरंगाबाद गांव की टेराकोटा हस्तशिल्प का नाम आते ही उसकी एक से बढ़कर एक सुंदर कलाकृतियों की तरफ सबका ध्यान चला ही जाता है। यहां के कई कुम्हारों को इसी कला की वजह से सात समंदर पार जाने का मौका भी मिल चुका है। कुछ कुम्‍हारों को नेशनल और इंटरनेशनल अवॉर्ड भी मिल चुका है, लेकिन हकीकत कुछ और है। औरंगाबाद गांव के टोला भरवलिया के दलित परिवारों का आरोप है कि यहां के कुम्‍हार उनकी द्वारा बनाई गई कलाकृतियां कम दामों पर खरीद लेते हैं और उसे ऊंची कीमत पर बेच देते हैं। यहां तक कि उनकी कई कलाकृतियों को बेचकर अवॉर्ड भी जीत चुके हैं। ऐसे में सरकार की ओर से मिली सारी सुविधाएं कुम्‍हारों को मिल जाती हैं और दलितों का परिवार हुनरमंद होने के बावजूद भी उपेक्षा के शिकार हैं।
भरवलिया गांव की टेराकोटा की हुनरमंद दलित महिला नीलम, विद्यावती, तारा देवी, सुनीता देवी, बलवंती देवी, आरती देवी और शकुंतला देवी ने बताया कि औरंगाबाद के 12 कुम्हार परिवारों को जिला प्रशासन सड़क से लेकर पानी तक मुहैया करा चुका है। उनके लिए टेराकोटा भवन बनाया गया है। जिसका निचला हिस्सा वो वर्कशेड, जबकि ऊपरी हिस्से को गोदाम के रूप में प्रयोग करते हैं। इसके अलावा इनके उस पोखरे का सौंदर्यीकरण कराया गया है, जहां से ये टेराकोटा मिट्टी निकालते हैं। इस गांव में टेराकोटा रिसर्च सेंटर बनाया गया है, जिसका प्रयोग अमूमन वे लोग स्टोर के लिए ही करते हैं, लेकिन दलित परिवारों के लिए इनमें से कोई सुविधा नहीं है, जबकि ये कुम्‍हार उन्‍हीं लोगों से मूर्तियां खरीदरकर बेचते हैं।
कई कुम्‍हारों को मिल चुका है नेशनल-इंटरनेशल अवॉर्ड
उन्‍होंने बताया कि औरंगाबाद गांव के 12 कुम्हार परिवारों का नाम बड़े ही सम्मान से लिया जाता है। इनमें से कई को नेशनल और इंटरनेशनल अवॉर्ड मिल चुका है। वहीं, औरंगाबाद गांव के टोला भरवलिया (कभी राजस्व अब जनेश्वर मिश्र ग्राम) के 36 दलित परिवार, जिन्‍हें टेराकोटा हस्‍तशिल्‍प में महारत हासिल हैं, लेकिन जिला प्रशासन की अनदेखी से उपेक्षा के शिकार हैं। इन हुनरमंद परिवारों को ऐसी कोई सुविधा मुहैया नहीं कराई गई है, जिससे कि ये अपने कारोबार में वृद्धि कर सकें और अपना जीवन बेहतर बना सकें। दूसरी ओर, यहां के कुम्‍हार इन्‍हीं के कच्‍चे कलाकृतियों को खरीदकर और रंग रोगन कर ऊंचे दामों में बेच देते हैं और नाम भी कमाते हैं। ऐसे में इन दलितों को सुविधा मिलने के बजाय कुम्‍हारों को मिल जाती है। यहां तक कि इनकी कलाकृतियों का प्रजेंटेशन कर यहां के कुम्‍हार अवॉर्ड भी हासिल कर चुके हैं।
12 रुपए में मूर्ति खरीदकर 50 रुपए में बेचते हैं कुम्‍हार
इसी प्रकार मास्टर ट्रेनर नंदलाल, अनिल कुमार, अशोक कुमार, संजय कुमार, विजयेंद्र कुमार, राम जतन बजरंगी लाल आदि ने बताया कि गांव के हरिश्चंद्र गौतम नाम के एक नेता ने पोखरे को कब्जा कर रखा है। एक-दो बार उनकी ओर से प्रयास किया गया, लेकिन योजना को उसके द्वारा फेल कर दिया जाता है। इसी प्रकार ग्राम प्रधान का पद औरंगाबाद गांव में ही हमेशा रहता है, जिसके कारण विकास कार्य भी वहां अधिक होता है। टेराकोटा हस्तशिल्प के उक्त हुनरमंदों ने बताया कि वे अपनी टेराकोटा कलाकृतियों को कच्चे ही औने-पौने दामों में औरंगाबाद के कुम्हारों के हाथों में बेचने को मजबूर हैं, क्‍योंकि व्यापारी भी सीधे वहीं जाते हैं। रेट के सवाल पर उन्‍होंने कहा कि एक छोटा कछुआ कलाकृति वे उनसे 12 रुपए में कच्चा लेते हैं और पकाने के बाद उसे 50 रुपए से अधिक दाम पर बेचते हैं।
ये दलित परिवार जुड़े हैं टेराकोटा हस्‍तशिल्‍प के धंधे से
भरवलिया गांव के दलित नंदलाल, रामशरण, नागेन्द्र, संजय, राम सिंह, अशोक, राधेश्याम, अनिल, राम जतन, गुलाब चंद, ज्ञानती, राम प्रसाद, हरिश्चंद्र, बब्लू, उमाशंकर, घनश्याम, रामनगीना, बिजयेंद्र, अशोक, रामबदन, अक्षयवर, सुनीता, जयगौतम, रामा प्रसाद, नीलम, चतुरी प्रसाद, लक्ष्मीना देवी, राम कुंवर आदि के घरों के एक-एक सदस्य टेराकोटा हस्तशिल्प के इस धंधे से जुड़े हुए हैं। ये अपने घर में ही टेराकोटा हस्तशिल्प की कलाकृतियां बनाते हैं और सोने के स्थान पर उसे रखकर सुखाते हैं। इनके दरवाजे पर इन कलाकृतियों को पकाने के लिए भट्ठी बनाने की जगह नहीं है।
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