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इस ट्रेन से नहीं निकलती गार्ड की भी सैलरी, फिर भी है चलती, जानें क्‍यों

6 वर्ष पहले
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झांसी. बुंदेलखंड के जालौन में कोंच-एट कस्बे के बीच एक ऐसी ट्रेन चलती है, जि‍से यात्री ऑटो कहते हैं। रास्ते में हाथ देने पर ये किसी ऑटो या बस की तरह रुक जाती है और सवारी बैठाकर आगे बढ़ती है। गौर करने वाली बात ये है कि इस ट्रेन से गार्ड तक की सैलरी नहीं निकल पाती, फिर भी यह रोजाना सवारी ढोती है।

क्या है ट्रेन की खासियत
- 118 साल से दो कस्बों के बीच चल रही यह ट्रेन अद्दा नाम से मशहूर है।
- 35 मिनट में 13 किलोमीटर का सफर तय करती है।
- ट्रेन में सिर्फ 3 डिब्बे हैं।
- 5 रुपए है किराया।
- करीब 500 लोग एक बार में सफर करते हैं।

ट्रेन बंद करने की हो चुकी है कोशिश
- कोंच स्टेशन मास्टर अरुण पटेल कहते हैं, एट से कोंच तक सिर्फ यही एक ट्रेन चलती है।
- दोनों कस्बों के बीच ट्रेन 5 चक्कर लगाती है।
- ट्रेन के संचालन से स्टेशन मास्टर से लेकर गार्ड तक की तनख्वाह नहीं निकलती।
- इस कारण इसे बंद करने की कई बार कोशिश हो चुकी है।
- लोगों के विरोध के चलते यह बंद नहीं हो सकी।
- कोंच के लोगों का कहना है कि यही एकमात्र ट्रेन है, जो आधुनिक होने का अहसास दिलाती है।
- क्षेत्रीय सांसद भानुप्रताप वर्मा कहते हैं, शटल ट्रेन बंद नहीं होने देंगे।

पहले एक बोगी के साथ चलती थी ये ट्रेन
- अंग्रेजों ने 1902 में माल ढोने के लिए इस ट्रेन की शुरुआत की थी।
- उस समय यह ट्रेन मालगाड़ी के रूप में चलती थी। इसमें सिर्फ एक बोगी होती थी।
- जालौन जिले का कोंच कस्बा कभी देश का मुख्य कपास उत्पादक और बिक्री का बड़ा केंद्र हुआ करता था।
- एट में पहले से झांसी-कानपुर को जोड़ती हुई रेल लाइन थी।
- इसीलिए अंग्रेजी हुकूमत ने कोच मंडी तक रेल लाइन बिछाई।
- अंग्रेज मंडी से कपास की गांठें, गेहूं और अन्य सामान कोलकाता और मुंबई भेजा करते थे।
- वहां से माल मैनचेस्टर भेजा जाता था, जहां कपड़ा बनाकर ब्रिटेन और भारत में बेचा जाता था।
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