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ऐसी होती है पोस्‍टमॉर्टम करने वालों की LIFE, जानिए उन्‍हीं की जुबानी

पोस्टमॉर्टम हाउस को कोई भूतों का घर कहता है तो कोई इसे मुर्दों का अड्डा समझता है।

Dainik Bhaskar

Oct 05, 2016, 10:00 PM IST
Inside Story Of Postmortem House
झांसी. पोस्टमॉर्टम हाउस को कोई भूतों का घर कहता है, तो कोई मुर्दों का अड्डा। लाशों और उड़ती बदबू के बीच मंजर इतना खौफनाक होता है, जिसकी आम इंसान कल्पना नहीं कर सकता। dainikbhaskar.com ने झांसी जिले के पोस्‍टमॉर्टम हाउस में काम करने वाले शख्‍स रंजीत बाल्‍मीकि से बात की। उन्‍होंने बताया, अंदर किस तरह से उनकी लाइफ नर्क जैसी होती है। उठते-बैठते, सोते-जागते सिर्फ लाश ही नजर आती है।
अब तक 23 हजार से ज्‍यादा कर चुके हैं पोस्टमॉर्टम
- पिछले 13 साल से पोस्टमॉर्टम हाउस में लाशों के बीच रह रहे रंजीत अब तक करीब 23 हजार लाशों के पोस्टमॉर्टम कर चुके हैं।
- उन्‍होंने बताया, डॉक्‍टर के आने से पहले मैं लाशों का चीर-फाड़ करता हूं, जिसके बाद मैं पूरी तरह खून से लतपथ हो जाता हूं।
- इस काम के बाद जब मैं घर पहुंचता हूं तो बच्चे दूर भागते हैं। साथ में खाना तक नहीं खाते।
- यही नहीं, रात में कई बार पत्नी डरकर मुझे भूत समझ बैठती है।

डॉक्टर्स से ज्‍यादा इनके लिए होती है मुश्किल
- वे कहते हैं, एक दिन में करीब 5 शवों की चीर-फाड़ करते हैं।
- डॉक्टर्स से कहीं ज्‍यादा परेशानी लाशों को खींंचकर यहां-वहांं रखने वालोंं को होती है।
- वे सड़ी-गली लाशों के बीच न सिर्फ रहते हैं, बल्कि उन्हें उठाकर पोस्टमॉर्टम हाउस के अंदर रखते हैं और डॉक्टर्स के देखने से पहले ब्लेड व अन्य औजारों से लाश की चीर-फाड़ करते हैं।

आगे की स्‍लाइड्स में जानिए एक बार डॉक्टर भी लगे थे भूत...
Inside Story Of Postmortem House
 
अंदर जाते ही पता नहीं चलता कि दिन भर क्या किया
 
- पोस्टमॉर्टम हाउस में काम करने वाले अक्सर नशे में रहते हैं, लेकिन रंजीत बताते हैं कि उन्‍होंने कभी भी नशा नहीं किया।
- अंदर घुसते ही उन्हें पता नहीं चलता कि मुर्दों के बीच उन्होंने क्या किया।
- शुरूआत में थोड़ी परेशानी होती थी, लेकिन अब कभी दिक्कत नहीं होती।
 
इस तरह होता है पोस्टमॉर्टम
 
- एक पोस्टमॉर्टम में लगभग 20 मिनट लगते हैं। रंजीत बताते हैं कि पोस्टमॉर्टम के लिए हथौड़ा, कुल्हाड़ी नहीं चलाई जाती।
- एक 23 नंबर ब्लेड आता है, जिसे फ्रेम में लगा लेते हैं।
- अधिकतर लाशों को गले से लेकर पेट तक का हिस्सा बीच से खोल लिया जाता है।
- आत्महत्या वाले मामले में लाश को ब्लेड से गर्दन के ऊपर थोड़ा से खोल लिया जाता है।
- यदि मामला आत्महत्या का नहीं होता, तो उसे गर्दन से नीचे पेट तक खोला जाता है।
- इतने में वह खून से लथपथ हो जाता है।
Inside Story Of Postmortem House
 
एक बार डॉक्टर भी लगे थे भूत
 
- रंजीत बताते हैं कि वह भी पोस्टमॉर्टम हाउस में कई बार डर चुका है। अक्सर रात में ऐसा होता है।
- एक बार जिला प्रशासन ने रात में ही पोस्टमॉर्टम के आदेश दिए थे।
- वह शव को पोस्टमॉर्टम हाउस के अंदर ले जा रहा था, तभी शव का हाथ दरवाजे से अटक गया।
- काफी कोशिश के बाद भी शव अंदर नहीं गया। उसने डरकर शव को वहींं छोड़ दिया। 
- बिजली नहीं थी, इसी बीच मोमबत्ती भी अचानक बुझ गई और डॉक्टर आ गए। डॉक्टर ने उस रात काले कपड़े पहने थे।
- जिस कार से वे आए, वह भी काली थी। उसने डॉक्‍टर को भूत समझ लिया और डर गया। 
- डॉक्टर कुछ कहते हुए उनकी ओर बढ़ रहे थे और वह बिना जवाब दिए पीछे की ओर।
- सुना था कि भूत के पैर उलटे होते हैं। उनक पैरों की ओर देखा तो जान में जान आई। 

किसी ने पकड़ ली थी गर्दन
 
- रंजीत कहते हैं कि एक बार वह पोस्टमॉर्टम हाउस के अंदर ही चारपाई डाल कर लेटे हुए थे। उन्‍हें नींद आ गई। 
- अचानक उसे लगा जैसे किसी ने उनका गला पकड़ लिया है।
- किसी तरह उन्‍होंने गला छुड़ाया और बाहर की ओर भागे।
 
 
Inside Story Of Postmortem House
 
बच्‍चों का पोस्टमॉर्टम करना मुश्किल 
 
- वे कहते हैं कि छोटे-छोटे बच्चे, जिनकी उम्र एक-दो साल होती है, उनकी चीर-फाड़ करना मुश्किल होता है। 
- ऐसे वक्‍त उनके हाथ भी कांंप जाते हैं। उस टाइम उन्‍हें लगता है कि वह ये काम छोड़ देंं।
Inside Story Of Postmortem House
दुनिया का है सबसे मुश्किल काम
 
- कई साल तक पोस्टमॉर्टम करने वाले जिला अस्पताल के चिकित्सक डॉ. प्रभात चौरसिया बताते हैं कि ये दुनिया के सबसे कठिन कामोंं में से एक है।
- उनके लिए कई बार मुश्किल आई। वहीं शवों को उठाकर पोस्टमॉर्टम हाउस तक लाने वाले यूसुफ मौलाना और श्याम सुन्दर शर्मा भी इसे मुश्किल काम मानते हैं।
- वह कहते हैं कि आखिर ये काम इंसान नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा। मरने के बाद भी आखिर मरने वाला इंसान ही होता है।
 
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