झांसी. महोबा जिले के 12वीं शताब्दी के वीर योद्धा आल्हा और ऊदल की वीरता की कहानी उत्तर भारत के घर-घर में कही जाती है। इन योद्धाओं ने अलग-अलग 52 लड़ाइयां लड़ीं और सभी में विजयी हुए। दोनोें ने पृथ्वीराज चौहान और उनकी सेना को भी लड़ाई में काफी नुकसान पहुंचाया था। dainikbhaskar.com आपको आल्हा ऊदल से जुड़े और किस्सों को बताने जा रहा है।
लोग आज भी करते हैं आल्हा ऊदल का सम्मान
- स्थानीय लोगों का कहना है कि 800 साल बीतने के बाद भी महोबा के ऊदल चौक से ऊदल के सम्मान में लोग घोड़े पर सवार होकर नहीं गुजरते हैं।
- शादियों के समय में दूल्हे को यहां घोड़े पर बैठाकर नहीं गुजारा जाता है।
- इस पर अंग्रेज प्रशासक जेम्स ग्रांट ने लिखा है, 'एक बार एक बरात जा रही थी और दूल्हा घोड़े पर बैठा था। जैसे ही बरात ऊदल चौक पर पहुंची, घोड़ा भड़क गया और उसने दूल्हे को पटक दिया। मैं सुनते आया था कि ऊदल चौक पर कोई घोड़े पर बैठकर नहीं जा सकता, लेकिन आज मैंने यह प्रत्यक्ष रूप से देखा।'
आल्हा ऊदल की कहानी के बिना पूरे नहीं होते सामाजिक संस्कार
- महोबा में ज्यादातर सामाजिक संस्कार आल्हा ऊदल की कहानी के बिना पूरे नहीं माने जाते हैं।
- बच्चों के नाम भी आल्हखंड से लेकर रखे जाते हैं।
- पूरे महोबा और बुंदेलखंड में कई जगह हैं, जो दोनों योद्धाओं की याद दिलाते हैं।
बचपन से पराक्रमी थे आल्हा ऊदल
- आल्हा ऊदल मंच के दाऊ तिवारी बताते हैं कि आल्हा-ऊदल महोबा के जच्छराज और माता देवला की संतान थे।
- आल्हा बड़े तो ऊदल उनके छोटे भाई थे। दोनों बचपन से ही बेहद पराक्रमी थे।
- जब दोनों भाई तलवार लेकर निकलते थे, तो दुश्मनों में हाहाकार मच जाता था।
- महोबा और बुंदेलखंड के लोग आज भी आल्हा ऊदल की वीरता का सम्मान करते हैं।
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