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पहली बार bhaskar.com पर पान सिंह तोमर की फैम‍िली, कहा- वो डकैत नहीं, बागी थे

4 वर्ष पहले
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झांसी. सेना में शामिल होने के बाद अंतर्राष्ट्रीय एथलीट बनकर कई मेडल जीतने वाले पान सिंह तोमर की मरते समय भले ही पहचान एक डकैत की रही हो, लेकिन उनका परिवार पान सिंह को डकैत नहीं मानता। पान सिंह को उनके परिवार का कोई सदस्य 'साहब' कहता है तो कोई सूबेदार। उनके बेटे शिवराम सिंह तोमर भी आर्मी से रिटायर हो चुके हैं। जब dainikbhaskar.com पान स‍िंह के घर पहुंचा ताे उनकी पत्नी, बेटे और परिवार के दूसरे मेंबर्स ने बातचीत की। परिवार की अब एक ही ड‍िमांड है क‍ि पान स‍िंह के नाम पर स्टेडियम बन जाए, क्योंक‍ि उनका खेलों की ओर झुकाव था। पर‍िवार का कहना है क‍ि सरकार को इस दिशा में कुछ कदम उठाना चाहिए। बता दें, ये पहला मौका है, जब किसी प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या ऑनलाइन मीडिया से पान सिंह तोमर के परिवार ने बातचीत की है। बेटे शिवराम कहते हैं कि वह किसी से मिलना नहीं चाहते हैं। इतिहास में जो भी हुआ, वह अच्छा नहीं था। झांसी से 25 क‍िमी दूर रहती है पान सिंह की फैम‍िली...    
 
 
- झांसी से करीब 25 किमी दूर बबीना कस्बे में पान सिंह तोमर की पत्नी इंदिरा देवी अपने बेटे शिवराम सिंह, बहू और बच्चों के साथ रहती हैं। इंदिरा सिंह तोमर की उम्र करीब 85 साल है।
- वह बताती हैं, ''मैं सुबह 4 बजे जागकर नहा लेती हूं और उसी के बाद से मेरी दिनचर्या की शुरुआत होती है। अब काफी कुछ बदल गया है।''
- पान के बारे में पूछने पर इंदिरा कहती हैं, ''जो हुआ, वो अच्छा नहीं था। वो बहुत नरम स्वभाव के थे। वह बागी नहीं होते, लेकिन हालात ने उन्हें ऐसा करने को मजबूर कर दिया।'' 
 
पान के बेटे बोले- मैं पुलिस में जाना चाहता था, पर पिता ने ऑर्मी में भर्ती कराया
- पान सिंह के बेटे शिवराम  1996 में ऑर्मी से रिटायर हुए। उनके 5 बच्चे हैं। शिवराम के बड़े भाई हनुमंत सिंह भी ऑर्मी में थे। चार साल पहले सड़क दुर्घटना में उनकी मौत हो गई। 
- शिवराम सिंह बताते हैं, ''मैं पुलिस डिपार्टमेंट में भर्ती होना चाहता था, लेकिन पिता ने ऑर्मी में भर्ती कराया। उन्होंने बड़े और चचेरे भाई सहित कई को ऑर्मी में भेजा। पिता जी मानते थे कि पुलिस में रहकर इतनी सुरक्षा नहीं है, जितनी ऑर्मी में होती है। वे मुझे लड़ाई-झगड़ों से दूर रखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने ऑर्मी को चुना।''
- पान सिंह के बारे में शिवराम बताते हैं, ''साहब, फिजिकली बहुत मजबूत थे। उनकी जिंदगी बेहद सामान्य थी। सिस्टम और परेशान कर रहे लोगों से लड़ने के लिए उन्हें बागी बनना पड़ा। जिस दिन वह दुनिया से विदा हुए, वो दिन
परिवार के लिए बेहद दर्द भरा था।''
- डकैत शब्द का इस्तेमाल करने पर शिवराम टोंकते हुए कहते हैं कि पिता जी पेशेवर अपराधी नहीं थे। वो बागी थे। जहां पिता बागी हुए थे, वहां वे तीन-चार दशक में सिर्फ एक-दो बार गए होंगे। झांसी में भी वह किसी से मिलना पसंद नहीं करते हैं। वह कहते हैं कि मैं लड़ाई-झगड़ों से दूर रहना चाहता हूं।

पान सिंह की गैंग में रहे बलवंत ने बताए अपने अनुभव, बोले- काका जैसा कोई नहीं... 
- पान सिंह तोमर की गैंग में कितने मेंबर्स थे, ये पूछने पर भिंड के भिदौसा के रहने वाले (अब ग्वालियर में निवास) उनके साथी और सगे भतीजे पूर्व डकैत बलवंत सिंह तोमर (हंसते हुए) कहते हैं, ''काका और हम दो जने, तो का करेंगे 100 जने'' मतलब पान सिंह और मैं अगर हूं तो 100 लोग क्या कर पाएंगे।
- वह बताते हैं कि पान सिंह कंधे पर बंदूक रखते थे। कंधे पर बंदूक रखकर ही वह निशाना लगा देते थे। उनका निशाना अचूक था। उनके सामने कोई नहीं टिक पाता था।
- बलवंत ने आगे बताया, ''पान सिंह के एनकाउंटर के एक साल बाद मैंने 1982 में सशर्त समर्पण किया। 11 साल तक जेल में रहा। मुझे कभी हथकड़ी नहीं लगाई गई। खुली जेल में रखा गया। 20 बीघा जमीन भी दी गई थी।''
- ''पान सिंह से चली पुलिस की 13 घंटे की मुठभेड़ के दौरान मैं बचकर भाग निकला था। बाद में सरकार ने मुझ पर एक लाख रुपए का इनाम घोषित किया था।
 
आगे की स्लाइड्स में पढ़‍िए, जब पान स‍िंह के एनकाउंटर की कई देशों ने की थी निंदा... 
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