लखनऊ. देश में सिनेमा के 100 साल पूरे होने के मौके पर आज हम आपको बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान रखने वाली नवाबों की नगरी यानी लखनऊ की सरजमीं पर फिल्मी संसार की कहानी पेश कर रहे हैं। यहां हर एक सिनेमा हॉल की अपनी अलग कहानी है। ये वही शहर है, जहां अंग्रेजों की डॉग एंड इंडियंस नॉट एलाउड की सोच का जवाब एक नवाब ने सिनेमाघर बनाकर दिया।
एक जर्मन लेडी का विशेष योगदान इस सिनेमाघर को गया। जाने माने संगीतकार नौशाद साहब इसी सिनेमाघर में एक रुपए रोज पर हारमोनियम बजाते थे। एक ऐसा सिनेमाघार भी था, जिसे तवायफों ने बंद कर दिया। यही नहीं लखनऊ में प्रिंस ऑफ वेल्स की याद में एक सिनेमाघर बना। और भी बहुत कुछ है, चलिए लेकर चलते हैं आपको नवाबों की नगरी जानी मानी सड़कों पर, जहां टिकट खरीदने के लिए लंबी कतारें दिखती थीं।
वैसे तो लखनऊ में सबसे पहले चौपटियों वाली दिलाराम की बारादरी ही जनता का रंगमंच रही। बाद में जब आगा हश्र कश्मीरी का दौर आया तो गोलागंज बुलंदबाग में बब्बे साहब रिफह आम क्लब के सामने मेडन थिएटर बनवाया। उसमें हिंदुस्तानी ड्रामे और थिएटर हुआ करते थे। अंग्रेजों ने पहले से ही अपने दिलबहलाव के लिए कोठी हयातबख्श और बेगम कोठी के बीच हजरतगंज के एक सिरे पर रिंग थिएटर बनवा रखा था। इस बॉलरूम डांस के साथ ही यहां थिएटर भी होते थे। कुछ समय बाद पर्दे की व्यवस्था करके यहां साइलेंट इंग्लिश फिल्मों के शो होने लगे। इस रिंग थिएटर में हिंदुस्तानियों का प्रवेश वर्जित था, थिएटर के बाहर लिखा रहता था कि डॉग्स एंड इंडियंस आर नॉट एलाउड।
तस्वीरों के जरिए देखिए नवाबों की नगरी में सिनेमा के 100 साल...