फोटो: कम कीमत वाली किताबों के स्टॉल पर अपनी पसंद की किताब चुनती युवती।
लखनऊ. कहने को तो किताबों को इंसानों का सच्चा साथी बताया गया है लेकिन समय और मंहगाई ने लोगों को किताबों से दूर कर दिया है। इसका असर लखनऊ में चल रहे 12वें नेशनल बुक फेयर पर भी देखने को मिला। 10 दिनों तक चले इस फेयर में इस बार उम्मीद से कम लोग किताबें लेने आए। जो थोड़ी बहुत भीड़ दिखी भी वह भी केवल डिस्काउंट वाली दुकानों पर। अखिरी दिन संडे होने के बावजूद दुकानदारों को सिर्फ निराशा ही हाथ लगी।
रविवार को मोती महल लान में बीते 19 सितंबर से शुरू हुए 12वें नेशनल बुक फेयर का समापन हुआ। फेयर में विभिन्न प्रतियोगिताओं में विजेता प्रतिभागियों का सम्मान किया गया। पुरस्कार पाकर जहां बच्चे खुश नजर आ रहे थे, वहीं बच्चे के अभिभावकों के चेहरे पर भी खुशी साफ झलक रही थी। रविवार को देखते हुए लोगों की भीड़ तो उमड़ती दिखी, लेकिन खरिददारी में ज्यादा उत्साह नहीं दिखा। लोग भी किताबें खरीदने से ज्यादा, पन्ना पलटते और दामों पर नजर गड़ाते ही दिखे।
डिस्काउंट वाली दुकानों पर रही ज्यादा भीड़
कहने को तो बुक फेयर में ऑक्सफोर्ड, राजकमल, वाणी प्रकाशन, पुस्तक महल, पुस्तक प्रकाशन जैसे नामी प्रकाशन भी थीं। हालांकि, बिक्री उस तरह से नहीं हुई जैसी होनी चाहिए थी। सबसे आखिरी में लगी डिस्काउंट की दुकानें जो 20 से लेकर 100 रुपए में चार-पांच किताबें तक बेच रहे थे वहीं लोगों की भीड़ दिखी। युवा जहां सिडनी शेल्डन, जेफरी आर्चर जैसी कई नामी लेखको की किताबें 100 रुपए में दो लेकर खुश थे। वहीं पैरेंट्स बच्चों के लिए ड्राइंग और कलरफुल ऐजूकेशनल बुक 20 से 100 रुपए के बीच में लेकर खुश थे। बुजुर्ग लोग धर्म और कर्मकांड की किताबों को ज्यादा पसंद कर रहे थे।
प्रकाशक नहीं दिखे खुश
राजकमल प्रकाशन के अमोद महेश्वरी बताते हैं कि सेल कुछ खास नहीं रहा। उम्मीद से कम ही भीड़ रही। वैसे लोगों में आटोबॉयोग्रफी पर ज्यादा ध्यान रहा। वहीं, पुस्तक महल के महेश कांडपाल भी यही कहते हैं कि मंहगाई के कारण बिक्री कम ही हुई है। भारतीय ज्ञानपपीठ के राहुल ने बताया कि लोगों ने ज्यादातर गालिब छूटी शराब, गुनाहों का देवता और प्रेमचंद को ही पसंद किया।