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देश-विदेश में यूपी का नाम रोशन करने वाली हस्तियों को मिलता है यश भारती सम्‍मान

6 वर्ष पहले
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लखनऊ. सोमवार को यूपी सरकार ने कला, साहित्य, खेल सहित क्षेत्रों में यूपी का नाम देश-विदेश में रोशन करने वाली 56 हस्तियों को यश भारती सम्मान से नवाजा। लोहिया पार्क में आयोजित एक कार्यक्रम में मुलायम सिंह यादव और सीएम अखिलेश ने सभी हस्तियों को सम्मानित किया। इन हस्तियों ने अपने जीवन में संघर्ष कर अपनी विधा में महारत हासिल की है। इनमें से कई हस्तियों के साथ कई कहानियां भी जुडी हैं। पढ़िए इन हस्तियों को आखिर क्यों यूपी सरकार ने इस सम्मान के लिए चुना।

हामिदुल्लाह (हामिद हिंदी)

नवम्बर 1924 में जन्मे उर्दू और हिंदी के शायर हमीदुल्लाह ‘हामिद हिंदी’ के नाम से जाने जाते हैं। वे साथ के दशक से ही समाजवादी विचारधारा से जुड़े और इसका प्रचार जनता के बीच करते रहे। वे समाजवादी नेताओं चौधरी चरण सिंह और राजनारायण के संपर्क में आने के बाद लगतार उनके कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगे। वे इन नेताओं के विचारों के प्रचार-प्रसार में भी लगे रहे। हमीदुल्लाह समाजवादियों के बीच समाजवाद के लिविंग लीजेंड के नाम से जाने जाते हैं। हामिदुल्लाह की पहचान हिंदी, उर्दू और लोक भाषाओं में गीत, गजल, कविता और शेरो-शायरी के लिए जानी जाती है। वे 91 वर्ष की उम्र में भी उर्जावान हैं और समारोहों में उनकी आवाज सुनने के लिए लोग बेकरार रहते हैं।

प्रो. रीता गांगुली

लखनऊ के हाइली एजुकेटेड परिवार में पली-बढ़ी और बेगम अख्तर की शागिर्द रह चुकीं प्रो. रीता गांगुली ने संगीत की शिक्षा-दीक्षा ध्रुपद गायन के लिए प्रसिद्द विष्णुपुर घराने के गोपेश्वर बंदोपाध्याय द्वारा शांतिनिकेतन यूनिवर्सिटी में हुई। रीता गांगुली को तीन बार कथकली और भारतनाट्यम के लिए नेशनल स्कालरशिप मिल चुकी है। गांगुली ठुमरी गायन के लिए मशहूर रानी सिद्धेश्वरी की पहली ‘गंडाबंद शागिर्द’ बनीं थीं। रीता गांगुली ने गजल गायकी बारीकियों को बेगम अख्तर से सीखा था। गजल गायकी को सम्मान दिलाने के लिए इन्होंने बेगम अख्तर अकैडमी ऑफ गजल्स की स्थापना की थी। प्रो. गांगुली 2003 में पद्मश्री सम्मान से भी नवाजी जा चुकी है।

भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी ‘वागीश शास्त्री’

साल 2014-15 के लिए यश भारती सम्मान पाने वाले वाराणसी के भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी ‘वागीश शास्त्री’ अपने चाहने वालों के बीच बीपीटी के नाम से जाने जाते हैं। वे योग और संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान हैं। वे संपूर्णानंद संस्कृत यूनिवर्सिटी के इंडोलॉजिकल रिसर्च इंस्‍टीट्यूट के डायरेक्टर रह चुके हैं। करीब 30 साल तक संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय को अपनी सेवा देने वाले आचार्य वागीश शास्त्री को 1982 में ही काशी पंडित परिषद की ओर से महामहोपाध्याय की पदवी दी गई थी। उन्होंने 40 से अधिक किताबें लिखीं हैं और 300 से ज्यादा पांडुलिपियों का संपादन किया है। काशी परंपरा के संस्कृत के विद्वान डॉ. वागीश शास्त्री को साल 2013 में संस्कृत साहित्य में योगदान के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा गया था। उन्हें राजस्थान संस्कृत अकादमी की ओर से उन्हें बाणभट्ट पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। वागीश शास्त्री ने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘सरस्वती सुषमा’ का लगभग 30 सालों तक संपादन किया था।

आगे ​पढ़ि​ए दर्शन सिंह यादव...