लखनऊ. इन दिनों हाईस्कूल और इंटर की परीक्षाओं को लेकर सीबीएसई से लेकर आईएससी और यूपी बोर्ड के परीक्षार्थियों के सिर पर एग्जामफोबिया सवार हो गया है। छात्रों को अच्छे ग्रेड से पास होने की चिंता है। अभिभावक भी अपने बच्चों के सिर पर नंबर वन का ताज देखने की उधेड़बुन में लगे हैं। ऐसे में बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के सामने इतना दबाव होता है कि वे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। इसे दूर करने में मीठी गोलियां कारगर साबित हो सकती हैं।
परीक्षाओं का मौसम छात्रों के लिए अनेक परेशानियां लेकर आता है। इसे मेडिकल लैंग्वेज में एग्जामफोबिया कहते हैं। बच्चों को इससे मुक्त रखने के लिए अभिभावकों का सपोर्ट होना जरूरी है। अपने बच्चे पर कोई भी ऐसा मनोवैज्ञानिक दबाव नहीं बनाना चाहिए जिससे कि उनके अंदर डिप्रेशन के लक्षण आएं। अभिभावक या शिक्षकों द्वारा दबाव बनाने से स्टूडेंट्स में कई परेशानियां होने की संभावना रहती है।
मसलन पढ़ाई के दौरान मन को एकाग्र नहीं कर पाना, एक्जाम हॉल काल-कोठरी जैसा लगना, एक्जाम हॉल में प्रवेश से पहले शरीर में सिहरन, बार-बार पेशाब आना, दस्त की शिकायत, याद किया हुआ भूल जाना, आत्महत्या जैसे विचार आना, नींद नहीं आने की समस्या, फेल होने का भय, परीक्षा के समय पसीना आना आदि लक्षण देखने को आमतौर पर मिल सकते हैं। इन लक्षणों को दूर करने में होम्योपैथ की मीठी गोली कारगर साबित होती है। मीठी गोली के कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होते हैं।
30 से 40 फीसदी स्टूडेंट होते हैं एग्जामफोबिया से प्रभावित
एग्जामफोबिया के बारे में केंद्रीय होम्योपैथी परिषद के डॉ. अनिरूद्ध वर्मा बताते हैं कि यह एक मानसिक रोग है। परीक्षा में अच्छे अंकों से पास होने का दबाव सबसे बड़ी वजह है, जो अभिभावकों द्वारा बनाया जाता है। इस कारण बच्चे एक कमरे में कैद होकर रह जाते हैं। परीक्षा के दौरान खाने-पीने का रुटीन बदल जाता है। यह स्थिति ठीक नहीं है।
स्टूडेंट को कमरे में कैद होने के बजाय थोड़ी पढाई, घूमना-फिरना और मनोरंजन करना अच्छा होता है। ऐसे में अभिभावक अपने बच्चे के साथ सकारात्मक भूमिका अदा कर सकते हैं। छात्रों को परीक्षा से डरने की जरूरत नहीं है। इसका कारण यह है कि उचित सलाह के बावजूद कई छात्र इन परेशानियों से बच नहीं पाते हैं।
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