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अदब के शहर में दोस्‍ती हो रही दागदार, दोस्‍त ही बन रहे हैं कातिल

6 वर्ष पहले
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लखनऊ. दोस्ती वो नहीं जो जान दे सकती है, दोस्ती वो भी नहीं जो मुस्कान दे सकती है। सच्ची दोस्ती तो वो है, जो पानी में गिरा हुआ आंसू भी पहचान लेती है। नवाबी नगरी की जिस दोस्ती का बखान दुनिया में होता है, आज उसी जमीन पर दोस्ती शर्मिंदा है। दोस्त ही दोस्त के कातिल बन रहे हैं।

फरवरी महीने की शुरुआत में ही लगातार हुईं वारदातों से राजधानी दहल गई हैं। एक ओर मानवता शर्मसार हुई, तो दूसरी ओर दोस्ती पर बदनुमा दाग लगा। नए साल से शुरू हुआ यह सफर अभी भी बदस्तूर जारी है।

राजधानी में हुई सिलसिलेवार वारदातों पर एक नजर

तीन फरवरी

कृष्णानगर में अपने दोस्त के साथ घूमने निकले दवा व्यवसायी सदानंद मंगलानी के एकलौते बेटे का शव पुलिस को मिला। वह अपने दोस्त के साथ दो दिन पहले घर से घूमने के लिए निकला था, लेकिन वह वापस नहीं लौटा। मामले का खुलासा करते हुए पुलिस ने उसके दोस्त सुजीत और उसके मामा के लड़के को गिरफ्तार कर लिया।

दो फरवरी

गाजीपुर में स्थित फातिमा अस्पताल के संचालन में अहम भूमिका निभाने वाले बलराम शुक्ला की हत्या का खुलासा करते हुए पुलिस ने उनके ही दोस्तों अभिषेक और उमेश को गिरफ्तार कर लिया। बलराम के दोस्त उससे सिर्फ इसलिए जलते थे कि उसने कुछ ही समय में अच्छी तरक्की कर ली थी। हत्यारोपी बलराम की रईसी देख उससे ईर्ष्या करने लगे थे। महज वेतन मिलने पर हुई देरी में उसके दोस्तों ने बलराम की हत्या करने का कुचक्र रच डाला था।
आगे पढ़िए, क्‍या था राजधानी का बहुचर्चित गौरी मर्डर केस...